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Wednesday, 3 July 2013

मनमोहन राज में तीन गुना विदेशी कर्ज


 यूपीए सरकार के नौ साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भले ही यूपीए सरकार के कर्ता धर्ता कोई भी कहानी गढ़े और प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़त का हवाला देकर अपनी नीतियों को सही ठहराने की कोशिश करें लेकिन हकीकत यह है कि अगर एक तरफ डॉलर के मुकाबले रूपया लगातार कमजोर होता गया है तो दूसरी तरफ भारत पर विदेशी ऋण का बोझ लगातार बढ़ता गया है। 1991 में अगर महज 83.8 अरब डॉलर विदेशी ऋण होने पर सोना गिरवी रखने और देश का स्वाभिमान जगाने जैसी नौबत आ जाती है तो आज 390 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज के बोझ तले दबे भारत को विकास के रास्ते पर सरपट दौड़नेवाला खरगोश बताया जा रहा है।
ऋण लेने की यह आदत यूपीए सरकार के दोनों कार्यकाल में बहुत तेजी से बढ़ी है। मसलन, 1991 से 2004 तक जब तक विभिन्न दलों की सरकारें रही हैं विदेशी ऋण सौ बिलियन डॉलर के आस पास ही बना रहा है। हालांकि कमोबेश इस डेढ़ दशक की इस अवधि में भी विदेशी ऋण में कमी नहीं आई है लेकिन बढ़ोत्तरी की दर बहुत धीमी थी लेकिन 2004 में वित्तमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए सरकार बनने के साथ ही विदेशी ऋण लेनदारियां बहुत तेजी से बढ़ी हैं और एक दशक के भीतर इसमें तीन गुणे की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। 2004 में जब एनडीए का शासन खत्म हुआ था तब भारत पर 112.6 अरब डालर का ऋण था लेकिन मार्च 2013 तक भारत पर यह विदेशी ऋण बढ़कर 390 अरब डॉलर पहुंच गया है। इस ऋण में हाल में ही जापान से लिया गया वह ऋण शामिल नहीं है जो भारत सरकार ने बुलेट ट्रेन प्रणाली स्थापित करने के लिए लिया है। जापान भारत को बुलेट ट्रेन के लिए एक ट्रिलियन येन ऋण के रूप में देगा।
विदेशी कर्ज में इस बेतहाशा वृद्धि को लेकर अब भले ही राजनीतिक रूप से कोई हो हल्ला न मचता हो लेकिन आखिरकार इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। वर्तमान ग्लोबल अर्थव्यवस्था में माना जाता है कि उधार की पूंजी कोई परेशानी नहीं है। पूंजी अगर विकास कार्यों को गति देने के लिए इस्तेमाल की जा रही है तो उधार लेने में कोई हर्जा नहीं है। दुनिया का सबसे विकसित देश अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश भी है, जबकि विकासशील देशों में चीन सबसे बड़ा कर्जदार देश है। इसलिए यह कहना कि वर्तमान विकासवादी अर्थव्यवस्था में कर्ज से मर्ज की तरह परहेज करना चाहिए, शायद सही नहीं होगा। लेकिन एक सवाल जरूर उभरता है कि क्या भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था पर क्या कोई नकारात्मक असर नहीं होगा?
भारत सरकार पर इस वक्त जो 390 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है वह चीन की तुलना में आधा ही बैठता है। इसलिए विकासवादी यह तर्क देते हैं कि अगर विदेशी पूंजी और विदेशी कर्ज के बूते आप अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत कर सकते हैं तो विदेशी पूंजी और विदेशी कर्ज दोनों से परहेज करने का कोई तुक नहीं है। लेकिन परहेज बिल्कुल बेतुका भी नहीं है। विदेशी निवेश अगर अपने मुनाफे का बड़ा हिस्सा अपने साथ ले जाता है और मुनाफे के साथ कोई समझौता नहीं करता है तो विदेशी कर्ज भी किसी मर्ज की कोई अचूक दवा नहीं है। फिलहाल दिल्ली मेट्रो को छोड़कर भारत सरकार ने विदेशी कर्ज के बूते अब तक कोई ऐसी बड़ी परियोजना नहीं शुरू की है जिसे विकासवादी कर्ज मान लिया जाए लेकिन कर्ज की राशि और कर्ज की अदायगी आखिरकार आपकी अर्थव्यवस्था पर अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह का असर डालती है। अल्पकालिक स्तर पर भले ही विकास में पूंजी निवेश दिखाई देता हो लेकिन दीर्घकालिक तौर पर ऐसी परियोजनाएं सिर्फ कर्ज अदायगी करने का जरिया बनकर रह जाती हैं।
भारत पर इस वक्त जो विदेशी कर्ज है उसमें सबसे अधिक डॉलर में लिया गया कर्ज है। भारत का करीब 60 फीसदी कर्ज डॉलर की मुद्रा में लिया गया है जिसे डॉलर के रूप में ही वापस करना होगा। भारत सरकार द्वारा लिये गये कुल कर्ज का ज्यादातर हिस्सा लंबी अवधि के कर्ज के रूप में है। सुनने में यह बात अच्छी लग सकती है कि विकास कार्यों के लिए लंबी अवधि के कर्ज लिये गये हैं लेकिन चुकता करने के लिए लंबी अवधि के यही कर्ज तब बोझ बन जाते हैं जब लगातार आपकी मुद्रा का अवमूल्यन होता रहता है। डॉलर के मुकाबले जिस तरह से रूपये का अवमूल्यन हो रहा है उसमें एक डॉलर का कर्ज की कीमत हमारे लिए अगर कल तक 40 रूपये थी तो आज उसी एक डॉलर के कर्ज को चुकता करने के लिए हमें अपनी अर्थव्यवस्था से 60 रूपये निकालकर देने होंगे। यानी, जैसे जैसे रूपये का अवमूल्यन होगा डॉलर या विदेशी मुद्रा में लिये गये विदेशी कर्ज की राशि भी वास्तविक रूप में हमारे लिए बढ़ती चली जाती है। अल्पावधि के उधार चुकता करने में जहां हमें अपनी अर्थव्यवस्था को ऋणदाता की सुविधानुसार प्रभावित करना हमारी मजबूरी बन जाता है वहीं दीर्घकालिक उधार हमें दीर्घकालिक दर्द देकर जाता है।
बहरहाल भारत की जनता पर बढ़ते इस विदेशी ऋण बोझ के बारे में न तो सरकारें बहुत कुछ चिंता करती है और न ही जनता अब उस दौर की जनता रही जो विदेशी मुद्रा भंडार को भरने के लिए सोना गिरवी रखने जैसी भावनात्मक बातों पर ध्यान देती है। इसलिए मनमोहनॉमिक्स में अगर ऋण लेकर घी पीने को सबसे बढ़िया स्वास्थ्य का उपाय बताया जा रहा है तो जनता को भी इस बारे में सवाल करने की फुर्सत नहीं है।

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