जनता दल [यू] और भाजपा के 17 वर्ष पुराने रिश्तों का अंत होने की जो
स्थिति उत्पन्न हो गई है वह सिर्फ बिहार की राजनीति का ही प्रमुख प्रश्न
नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति का भी है। यह तय है कि इस घटनाक्रम का आने
वाले वर्षो में भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जदयू-भाजपा सरकार ने
बिहार को पुनर्निर्माण के पथ पर अग्रसर किया है। डेढ़ दशक बाद यह राज्य
विकास के पथ पर आगे बढ़ता नजर आया। भले ही नीतीश कुमार की सरकार के माध्यम
से बिहार को भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्ति न मिली हो, लेकिन भय और कानून
एवं व्यवस्था की खराब स्थिति से मुक्ति तो मिली ही।
नीतीश कुमार ने अपने 'सुशासन' को बिहार की आर्थिक विकास दर में बढ़त का भी कारण घोषित किया है, पर यह विवाद का विषय है। कुछ आंकड़े बताते हैं कि विकास की दर में बढ़त 1996 से ही दिखने लगी थी, जबकि नीतीश कुमार की सरकार 2005 में सत्ता में आई। बहरहाल उनके 'सुशासन' ने इस विकास को और सुदृढ़ जरूर किया।
स्पष्ट है कि राजग पर संकट के बादल छाने से बिहार का राजनीतिक भविष्य फिर खतरे में पड़ गया है। राजग के बिखरने से आगामी चुनावों में जदयू और भाजपा अलग-अलग उतरेंगे और इसके फलस्वरूप दोनों को ही अपने मौजूदा प्रभाव में कमी झेलनी होगी। यह बिहार के हित में नहीं होगा, क्योंकि इसका राजनीतिक लाभ जिन दलों को मिलेगा उनकी छवि कम से कम विकास को बढ़ावा देने वालों की नहीं रही है। कांग्रेस तो बिहार में नगण्य स्थिति में है और फिलहाल ऐसी कोई संभावना भी नजर नहीं आती कि वह बिना किसी गठबंधन के पुन: मजबूत होकर उभरे।
राजग के भविष्य की चर्चा आवश्यक है। मौजूदा आंधी के केंद्र में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ दो परस्पर-विरोधी मुद्दे जुड़ गए हैं। पहला 2002 के दंगों का दाग और दूसरा, गुजरात का असाधारण आर्थिक विकास तथा वहां लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव में उनकी विजय के कारण बनी करिश्माई नेतृत्व की उनकी छवि।
भाजपा इसे अपना सबसे बड़ा राजनीतिक संसाधन मानकर उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करने की तैयारी कर रही है। उन्हें पार्टी की चुनाव समिति की कमान सौंपना इसी की एक कड़ी माना जा रहा है। मोदी की यह बढ़त भाजपा के सहयोगी दलों के साथ-साथ पार्टी के कुछ नेताओं को भी रास नहीं आ रही है। नीतीश कुमार और शरद यादव समेत जदयू के दूसरे नेता पहले ही उनके नाम पर एतराज जता चुके थे। पिछले दिनों लालकृष्ण आडवाणी के त्यागपत्र का जो मामला सामने आया वह यही बताता है कि मोदी को अपने घर में भी जूझना पड़ रहा है।
आडवाणी को भाजपा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था, जिसे पूरे राजग की मान्यता मिली थी, लेकिन चुनाव में नाकामी ही हाथ लगी। शायद वह एक बार फिर हाथ आजमाना चाहते हैं, लेकिन भाजपा के नेतृत्व तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यह स्वीकार नहीं है। भाजपा और संघ की सर्वोत्तम बाजी आज मोदी बन चुके हैं। कई सर्वेक्षणों में मोदी किसी भी अन्य प्रधानमंत्री उम्मीदवार की तुलना में बहुत आगे नजर आए हैं। मोदी के नाम के कारण अल्पसंख्यक मत हाथ से फिसलने की चिंता कर रहे नीतीश कुमार शायद राजग की आंतरिक राजनीति में आडवाणी के साथ हैं। कुछ समय पहले जब आडवाणी ने अपनी एक यात्रा गुजरात के स्थान पर बिहार से शुरू की थी तभी यह महसूस किया जाने लगा था कि राजग के भीतर की खींचतान गंभीर होती जा रही है।
नीतीश कुमार की मौजूदा रणनीति के दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण तो स्पष्ट है कि वह सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहते हैं और दूसरा कारण आम चुनाव के बाद तीसरे या चौथे मोर्चे के ताकतवर होकर उभरने की संभावना का है। नीतीश को लगता है कि वह ऐसे किसी मोर्चे का नेतृत्व कर सकते हैं। वह यह भी सोच सकते हैं कि बिहार के चुनाव तो 2014 के आम चुनाव के एक साल बाद आएंगे तो क्यों न भाजपा से अलग होकर एक दांव आजमा लिया जाए।
भाजपा भी शायद इस रणनीति से प्रेरित हुई है कि 2014 में मोदी कार्ड पूरी ताकत से खेलकर अपनी शक्ति बढ़ा ली जाए। अगर भाग्य ने साथ दे दिया तो फिर जदयू वापस आने को विवश हो जाएगा। जयललिता का अन्नाद्रमुक वैसे भी मोदी का साथ देने के लिए तैयार दिखता है। भाजपा को शिवसेना तथा शिरोमणि अकाली दल का समर्थन भी पूरी मजबूती से हासिल है। आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के दूसरे राष्ट्रीय दल कांग्रेस से बेहतर रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा हुआ तो वह कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। भले ही कुछ राजनीतिक दल तीसरे या चौथे मोर्चे की वकालत कर रहे हों, लेकिन इसके आसार बेहद कम हैं कि ऐसा कोई मोर्चा अगली सरकार बना सकता है। इसका एक बड़ा कारण भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर ऐसे किसी दल का अभाव है जो वैकल्पिक मोर्चे की उसी तरह धुरी बन सके जिस तरह राष्ट्रीय मोर्चे में जनता दल धुरी के रूप में सामने आया था। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस विकल्प की वकालत करते रहे वाम दलों और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की स्थिति नाजुक है।
जहां तक भाजपा और जदयू के बीच रिश्ता टूटने का प्रश्न है तो इसका ज्यादा नुकसान जदयू को ही होना है। हो सकता है कि वह समता पार्टी वाली स्थिति में आ जाए। चूंकि राजद, लोजपा और कांग्रेस की भी स्थिति बिहार में बेहद खराब है इसलिए यह भी हो सकता है कि कोई नया चेहरा और नया दल सामने आए, जो लोगों को उनकी आकांक्षाएं पूरी करने का भरोसा दिला सके। इस मामले में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बिहार में जातियों की राजनीति एक लंबे समय से सभी दलों पर हावी रही है। खुद नीतीश कुमार ने भी जातियों के नए समीकरण बैठाने की कोशिश की है। यह इसी जातीय-मजहबी राजनीति का नतीजा है कि काम न करने वाली सरकारें भी सत्ता में लौटती रहीं और काम करने वाली सरकार ने खुद ही संकट के दलदल में फंसना स्वीकार कर लिया।
नीतीश कुमार ने अपने 'सुशासन' को बिहार की आर्थिक विकास दर में बढ़त का भी कारण घोषित किया है, पर यह विवाद का विषय है। कुछ आंकड़े बताते हैं कि विकास की दर में बढ़त 1996 से ही दिखने लगी थी, जबकि नीतीश कुमार की सरकार 2005 में सत्ता में आई। बहरहाल उनके 'सुशासन' ने इस विकास को और सुदृढ़ जरूर किया।
स्पष्ट है कि राजग पर संकट के बादल छाने से बिहार का राजनीतिक भविष्य फिर खतरे में पड़ गया है। राजग के बिखरने से आगामी चुनावों में जदयू और भाजपा अलग-अलग उतरेंगे और इसके फलस्वरूप दोनों को ही अपने मौजूदा प्रभाव में कमी झेलनी होगी। यह बिहार के हित में नहीं होगा, क्योंकि इसका राजनीतिक लाभ जिन दलों को मिलेगा उनकी छवि कम से कम विकास को बढ़ावा देने वालों की नहीं रही है। कांग्रेस तो बिहार में नगण्य स्थिति में है और फिलहाल ऐसी कोई संभावना भी नजर नहीं आती कि वह बिना किसी गठबंधन के पुन: मजबूत होकर उभरे।
राजग के भविष्य की चर्चा आवश्यक है। मौजूदा आंधी के केंद्र में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ दो परस्पर-विरोधी मुद्दे जुड़ गए हैं। पहला 2002 के दंगों का दाग और दूसरा, गुजरात का असाधारण आर्थिक विकास तथा वहां लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव में उनकी विजय के कारण बनी करिश्माई नेतृत्व की उनकी छवि।
भाजपा इसे अपना सबसे बड़ा राजनीतिक संसाधन मानकर उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करने की तैयारी कर रही है। उन्हें पार्टी की चुनाव समिति की कमान सौंपना इसी की एक कड़ी माना जा रहा है। मोदी की यह बढ़त भाजपा के सहयोगी दलों के साथ-साथ पार्टी के कुछ नेताओं को भी रास नहीं आ रही है। नीतीश कुमार और शरद यादव समेत जदयू के दूसरे नेता पहले ही उनके नाम पर एतराज जता चुके थे। पिछले दिनों लालकृष्ण आडवाणी के त्यागपत्र का जो मामला सामने आया वह यही बताता है कि मोदी को अपने घर में भी जूझना पड़ रहा है।
आडवाणी को भाजपा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था, जिसे पूरे राजग की मान्यता मिली थी, लेकिन चुनाव में नाकामी ही हाथ लगी। शायद वह एक बार फिर हाथ आजमाना चाहते हैं, लेकिन भाजपा के नेतृत्व तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यह स्वीकार नहीं है। भाजपा और संघ की सर्वोत्तम बाजी आज मोदी बन चुके हैं। कई सर्वेक्षणों में मोदी किसी भी अन्य प्रधानमंत्री उम्मीदवार की तुलना में बहुत आगे नजर आए हैं। मोदी के नाम के कारण अल्पसंख्यक मत हाथ से फिसलने की चिंता कर रहे नीतीश कुमार शायद राजग की आंतरिक राजनीति में आडवाणी के साथ हैं। कुछ समय पहले जब आडवाणी ने अपनी एक यात्रा गुजरात के स्थान पर बिहार से शुरू की थी तभी यह महसूस किया जाने लगा था कि राजग के भीतर की खींचतान गंभीर होती जा रही है।
नीतीश कुमार की मौजूदा रणनीति के दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण तो स्पष्ट है कि वह सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहते हैं और दूसरा कारण आम चुनाव के बाद तीसरे या चौथे मोर्चे के ताकतवर होकर उभरने की संभावना का है। नीतीश को लगता है कि वह ऐसे किसी मोर्चे का नेतृत्व कर सकते हैं। वह यह भी सोच सकते हैं कि बिहार के चुनाव तो 2014 के आम चुनाव के एक साल बाद आएंगे तो क्यों न भाजपा से अलग होकर एक दांव आजमा लिया जाए।
भाजपा भी शायद इस रणनीति से प्रेरित हुई है कि 2014 में मोदी कार्ड पूरी ताकत से खेलकर अपनी शक्ति बढ़ा ली जाए। अगर भाग्य ने साथ दे दिया तो फिर जदयू वापस आने को विवश हो जाएगा। जयललिता का अन्नाद्रमुक वैसे भी मोदी का साथ देने के लिए तैयार दिखता है। भाजपा को शिवसेना तथा शिरोमणि अकाली दल का समर्थन भी पूरी मजबूती से हासिल है। आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के दूसरे राष्ट्रीय दल कांग्रेस से बेहतर रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा हुआ तो वह कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। भले ही कुछ राजनीतिक दल तीसरे या चौथे मोर्चे की वकालत कर रहे हों, लेकिन इसके आसार बेहद कम हैं कि ऐसा कोई मोर्चा अगली सरकार बना सकता है। इसका एक बड़ा कारण भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर ऐसे किसी दल का अभाव है जो वैकल्पिक मोर्चे की उसी तरह धुरी बन सके जिस तरह राष्ट्रीय मोर्चे में जनता दल धुरी के रूप में सामने आया था। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस विकल्प की वकालत करते रहे वाम दलों और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की स्थिति नाजुक है।
जहां तक भाजपा और जदयू के बीच रिश्ता टूटने का प्रश्न है तो इसका ज्यादा नुकसान जदयू को ही होना है। हो सकता है कि वह समता पार्टी वाली स्थिति में आ जाए। चूंकि राजद, लोजपा और कांग्रेस की भी स्थिति बिहार में बेहद खराब है इसलिए यह भी हो सकता है कि कोई नया चेहरा और नया दल सामने आए, जो लोगों को उनकी आकांक्षाएं पूरी करने का भरोसा दिला सके। इस मामले में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बिहार में जातियों की राजनीति एक लंबे समय से सभी दलों पर हावी रही है। खुद नीतीश कुमार ने भी जातियों के नए समीकरण बैठाने की कोशिश की है। यह इसी जातीय-मजहबी राजनीति का नतीजा है कि काम न करने वाली सरकारें भी सत्ता में लौटती रहीं और काम करने वाली सरकार ने खुद ही संकट के दलदल में फंसना स्वीकार कर लिया।

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