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Monday, 12 May 2014

अब धुलने वाला नहीं है मनमोहन सिंह पर लग चुका दाग

 लोकसभा चुनाव के ऐन मौके पर प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहाकार रहे संजय बारु ने अपनी किताब ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एण्ड अनमेंकिंग ऑफ मनमोहन सिंह' और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख ने अपनी किताब में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में जो कुछ बताया है वो कुछ नया नहीं है।

इस लोकसभा चुनाव में युवाओं की भागीदारी पिछले चुनाव की अपेक्षा 80 प्रतिशत बढ़ी है। ये युवा देश को एक नई दिशा देने में, एक नया प्रधानमंत्री देने का या फिर एक नई सरकार बनाने में बड़ी भुमिका निभाएगा। देश भर में चुनावी प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार तेजी से चल रहा हैं, देश को एक नये उजाले का इंतजार है। हर पार्टी विपक्ष के दागी पत्ते खोलने का काम कर रही है। जबकि अब ये लगभग तय है कि यदि बीजेपी की सारी मोदी-गणित फेल भी हो जाये तो भी मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, फिर भी मनमोहन सिंह पर लग चुका दाग अब धुलने वाला नहीं है।

प्रधानमंत्री पर लगाये गये दाग पर प्रधानमंत्री की बेटी के साथ उनके नये मीडिया सलाहकार ने सफाई में बहुत कुछ कहा। प्रियका गांधी ने भी सफाई देते हुए कहा कि मनमोहन सिंह सरकार में उनके द्वारा लिया हुआ फैसला ही सर्वमान्य होता था। लेकिन भारत के उन युवाओं ने जो आज ग्लोबल दूनिया से हर वक्त रुबरु रहता है, मनमोहन सिंह के कार्यकाल को बहुत अच्छी तरह से रीड किया है। युवाओं को हर मौके पर उनकी चुप्पी अखरी है। कोयला घोटाले से लेकर टूजी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटालों पर उनकी खामोशी ने युवाओं के उस सपने को ध्वस्त किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत के हर युवा को रोजी-रोटी मिलेगी।

भारत में युवाओं का मानना है कि किताब में जो कुछ लिखा है और जिस पर सियासत हो रही है, ये नई बात नहीं है। सिर्फ इतना ही है कि इस पर किसी करीबी की मोहर लग जाने से बात की प्रामाणिकता पुष्ट हो गई है। चुनावी माहौल है और इस बार लड़ाई बराबरी की है इसलिए ये किताब सियासी चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस कार्यकाल में कई बार मनमोहन सिंह को जनता के सवालों का सामना करना पड़ा है, और अपनी बेबसी पर वो कई बार उदास भी नज़र आये हैं। देश के लिए मोदी कितने फिट हैं ये तो चुनाव के नतीजो के बाद ही समझ आयेगा, लेकिन मनमोहन सरकार को जनता ने दो बार मौका दे चुकी है।

इस पूरे चुनावी समर में भ्रष्टाचार का मुद्दा कहीं पीछे छुट गया है। जबकि जनता का अपनी आने वाली सरकार से ये एक अहम सवाल है कि वो सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार के लिए क्या करेगी। कांग्रेस राज में हुए घोटालों में भले ही प्रधानमंत्री की सहमती न हो लेकिन जनता के पैसों का दुरुपयोग होने और जनता के सवालों का जवाब देने में मनमोहन सरकार नाकामयाब रही है। उनकी बेबसी का फायदा मामूली से मामूली नेता ने उठाया है। देश के युवाओं को उनसे हमदर्दी है लेकिन एक प्रधानमंत्री से देश के युवाओं को जो उम्मीद होती हैं उस पर वो खरे नहीं उतरे, इसीलिए युवा किताब के मूल तथ्य से सहमत है।

दिल्ली में केजरीवाल की सरकार के पक्ष में युवाओं के खड़े हो जाने का मतलब यही था कि वो विकास के उस मॉडल से नाखुश है जो महज इमारातों तक सीमित है। और इसकी आड़ में जो घोटाले हो रहे हैं उसमें आम आदमी पिस रहा है। सभी अटकलों के बीच ये तय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल को युवा बहुत श्रद्धा से याद नहीं कर पायेंगे। उनके माथे पर एक दाग लग गया जिसे मिटाना अब मुमकिन नहीं।

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