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Thursday, 30 January 2014

वामदलों और आम आदमी पार्टी के बीच पक रही राजनीतिक खिचड़ी

कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल में जिस तरह से भाजपा बढ़ रही थी, उसमें सबसे ज्यादा परेशान वामपंथी दल थे. उन्हें ज्यादा परेशानी इस बात को लेकर थी कि यदि केंद्र में भाजपा की सरकार बनीं तो ममता बनर्जी भागीदार हो जाएगी और उनकी राजनीति दस साल पीछे जा सकती है लेकिन जैसे ‘आप’ के प्रति लोगों में रूझान दिखा उससे वामपंथी खेमे को अंधेरे में उम्मीद की किरण दिखाई दे गई. उसके बाद से ‘आप’ को लेकर वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों की सक्रियता बढ़ गई.

वामदलों और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीतिक खिचड़ी पक रही है. दरअसल, इसमें दोनों दलों के अपने-अपने हित सध रहे हैं. दिल्ली की कुर्सी मिलने के बाद ‘आप’ का मन केंद्रीय सत्ता में आने के लिए मचल रहा है. वहीं इस रणनीति के माध्यम से वामपंथी धड़ा तृणमूल कांग्रेस की राह में स्पीड ब्रेकर बनकर पश्चिम बंगाल में अपनी खोई राजनीतिक जमीन हासिल करना चाहता है.
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कम्युनिस्टों के साथ सटना ‘आप’ को इसलिए सुहा रहा है क्योंकि केंद्रीय स्तर पर लॉबिंग के लिए एक अहम मध्यस्त की उन्हें भी जरूरत है. वाम दलों की निगाहों आम आदमी पार्टी पर टिकी हुई हैं. सबसे बड़े वामपंथी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात कहते हैं, “दिल्ली में अल्पमत सरकार बनाने वाली ‘आप’ पर अभी कोई राय बनाना बहुत जल्दबाजी है. लेकिन यह अच्छी बात है कि ‘आप’ को मध्य वर्ग से अच्छा सहयोग मिला है. हम उनसे उनके कार्यक्रमों और नीतियों का इंतजार कर रहे हैं.” प्रकाश करात ने अपने इस बयान से यह जाहिर कर दिया है कि उन्हें ‘आप’ का इंतजार है.

.वामपंथी खेमे में बाहर से जितना सन्नाटा दिखाई दे रहा है, अंदर उतनी ही हलचल चल रही है. कांग्रेस के पराभव को देखते हुए वामपंथी दलों को जिस तरह की राजनीतिक सीढ़ी की तलाश थी, वह ‘आप’ के रूप में पूरी हो गई है. आप को आगे कर वामपंथी दल राजनीतिक तिराहा बनाने की जुगत भिड़ा रहे हैं. इससे उनके दो मकसद हल हो रहे हैं. पहला भाजपा को केंद्रीय सत्ता में आने से रोकने का और दूसरा तृणमूल कांग्रेस को घेरना का. वामपंथी दल जानते हैं कि केंद्रीय मदद के बगैर पश्चिम बंगाल सरकार ज्यादा दिन तक मजबूती से खड़ी नहीं रह पाएगी, क्योंकि उसकी आर्थिक हालात काफी नाजुक है.

32 साल के शासन के कारण उन्हें राज्यकोषीय नब्ज पता है. उन्हें ये भी मालूम है कि ममता बनर्जी को यदि पटखनी देनी है तो उसे राज्य की बजाए केंद्रीय स्तर पर झटका देना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि राज्य में इस समय वामपंथी दलों के खिलाफ उसी तरह का माहौल है, जैसे देशभर में कांग्रेस के विरूद्ध. बड़े रणनीतिक तरीके से कम्युस्टिों की एक टीम आम आदमी पार्टी के भीतर जाकर उनकी राजनीति को संचालित करने लगी है. ‘आप’ देश में अलग मिजाज के दल के रूप में अपनी छवि बना रहा है. उसकी कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों से दूरी बनाकर चलना और क्षेत्रीय दलों को “छूने से परहेज” उसी रणनीति का हिस्सा है. दरअसल, ‘आप’ के नेताओं को पता है कि वामपंथी दल के नेताओं का क्षेत्रीय दलों के साथ अच्छा संबंध है.




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