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Thursday, 29 August 2013

खाद्य या यूपीए-सुरक्षा बिल!



जब संसद के मॉनसून सत्र के पहले सरकार अध्यादेश लायी तो वृंदा करात ने कहा था, हम उसके समर्थक हैं, पर आपत्तियां भी हैं. हम चाहते हैं कि इस पर संसद में बहस हो. खाद्य सुरक्षा सबके लिए एक समान हो. मुलायम सिंह ने कहा था, यह किसान विरोधी है. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी कि मुख्यमंत्रियों से बात कीजिए. पर लगता है उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं से बात नहीं की. भाजपा के नेता इन दिनों अलग-अलग सुर में हैं. बिल पर संसद में जो बहस हुई, उसमें ज्यादातर दलों ने इसे ‘चुनाव सुरक्षा विधेयक’ मान कर ही अपने विचार रखे.
बिल पास होने के अगले दिन रुपया डॉलर के मुकाबले 66 की सीमा पार कर गया. मंगलवार को राज्यसभा में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि रुपये की कीमत केवल बाहरी कारणों से नहीं गिरी. अंदरूनी कारण भी हैं. 2008 की मंदी के वक्त हमने गलतियां कीं और राजस्व घाटे पर ध्यान नहीं दिया. चालू खाते के असंतुलन को नहीं रोका.

बहरहाल खाद्य सुरक्षा पर कोई भी पार्टी खुद को जन-विरोधी साबित नहीं करेगी. पर इसे लेकर अर्थशास्त्रीय दृष्टियां दो प्रकार की हैं. एक कहती है कि अंतत: इसकी कीमत गरीब जनता चुकायेगी. भ्रष्टाचार की एक और लहर का भी खतरा है. किसानों के समर्थन मूल्य में कटौती होगी. तंगहाल सरकार कम कीमत पर अनाज खरीदेगी. खुले बाजार में अनाज कम जायेगा, तो उसकी कीमत बढ़ेगी. किसान के इनपुट महंगे होंगे और आउटपुट सस्ता. पैसे की कमी से आर्थिक संवृद्धि के उपाय कम होंगे, आधारभूत ढांचे का विकास नहीं होगा. ग्रोथ रुकने से रोजगार घटेंगे. शहरी विकास प्रभावित होगा. यह नजरिया कहता है कि गरीबों को भोजन नहीं, पुष्टाहार की जरूरत है. उसके लिए अलग किस्म के हस्तक्षेप की जरूरत है. कांग्रेस मानती है कि यह कार्यक्रम ‘गेम चेंजर’ है. यानी चुनाव जिताने का मंत्र. विपक्ष मानता है कि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के पहले इसकी घोषणा करके सरकार प्रचारात्मक लाभ लेना चाहती है. वृंदा करात कहती हैं कि सरकार चार साल से सोयी थी. जयललिता, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, रमन सिंह और शिवराज सिंह इसे केंद्र-राज्य संबंधों के लिए अहितकर भी मानते हैं. इसमें राज्य सरकारों को न केवल लाभार्थियों की पहचान करनी है, इसके खर्च में हिस्सा भी बंटाना है. जयललिता कहती हैं कि सामाजिक सुरक्षा का मसला राज्य सरकारों के अधीन रहना चाहिए. दरअसल यूपी, बिहार तथा कुछ अन्य पिछड़े इलाकों को छोड़ दें, तो राज्य सरकारें अपने साधनों के आधार पर खाद्य सुरक्षा की योजनाएं चला भी रहीं है. अकाली दल कहता है कि इससे बेहतर हमारी ‘आटा-दाल’ स्कीम है, जो हम 2007 से चला रहे हैं. छत्तीसगढ़ 90 फीसदी नागरिकों को सस्ता अनाज देता है. मध्य प्रदेश में भी यह स्कीम है. तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली काम कर रही हैं. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने सभी नागरिकों को कवर करनेवाली योजना बनायी थी, पर सरकार ने लागू करने की हिम्मत नहीं दिखायी. अब जब यह कानून पास हो गया है, तो इसके उपबंधों की व्यावहारिकता की परीक्षा होगी. देखना यह है कि इस कानून में लोगों की शिकायतों की सुनवाई की व्यवस्था किस तरह काम करेगी?

सांसदों के रात्रिभोज में मोदी शामिल हुए



भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा पार्टी सांसदों के लिए गुरुवार को आयोजित रात्रि भोज में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी स्टार अतिथि थे। भोज के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी एक ही टेबल पर बैठे थे और दोनों को एक-दूसरे से गर्मजोशी से बात करते देखा गया। पार्टी सांसदों के लिए भाजपा अध्यक्ष द्वारा दिए जाने वाले वार्षिक रात्रि भोज में मोदी एकमात्र विशेष आमंत्रित अतिथि थे।

जहां मोदी जल्दी पहुंच गए और अतिथियों से बातचीत करते देखे गए, वहीं आडवाणी लोकसभा में भूमि अधिग्रहण विधेयक पर मतदान में हिस्सा लेने के बाद रात 10 बजे के बाद पहुंचे। सूत्रों ने बताया कि वह मोदी के साथ एक ही टेबल पर बैठे थे। बल्कि भाजपा की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष मोदी के बिल्कुल बगल में बैठे थे और दोनों एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे। टेबल पर राजनाथ के साथ लोकसभा और राज्यसभा में क्रमश: विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेटली भी बैठे थे। आडवाणी ने मोदी को भाजपा को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के प्रमुख पदों से इस्तीफा दे दिया था। बाद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हस्तक्षेप करने के बाद आडवाणी ने इस्तीफा वापस लिया था। रात्रिभोज में तकरीबन 200 भाजपा सांसदों ने हिस्सा लिया।

Sunday, 25 August 2013

मंदी और मंदिर



प्रेम शुक्ल

१९९१ में मनमोहन ने रुपया गिराया था, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए। उस गिरावट में भारत का अर्थतंत्र ऐसा फंसा कि कांग्रेस के हार की ‘हैट्रिक’ हुई थी। पर तब जिन लोगों ने भाजपा को वोट दिया था वह वोट रुपए को मजबूत करने की बजाय राममंदिर के भव्य निर्माण की जनाकांक्षा समेटे हुए था। रुपए के गिरने के साल भर बाद बाबरी गिरी थी। बाबरी के गिरने से हिंदू उत्साहित हुआ था। आज रुपया इतना गिरा है कि आम आदमी उसे उसे उठानेवाले को तलाश रहा है। अब आम रामभक्त अयोध्या में ८४ कोसी परिक्रमा के बाद भी भव्य राममंदिर के निर्माण के प्रति आश्वस्त नहीं। मंदिर निर्माण के लिए जिन आंखों ने २१ साल इंतजार कर लिया वे आंखें कुछ साल और इंतजार की रोशनी रखती हैं, पर क्या शक्तिशाली रुपए का निर्माण होगा? क्या नरेंद्र मोदी रुपए को डॉलर की मजबूती दे पाएंगे? यदि हां, तो समझो राममंदिर के भव्य निर्माण में भले विलंब हो ‘रामराज’ दूर नहीं होगा। क्या ‘रामराज’ लाने की योजना राजनाथ सिंह बनवा पाएंगे? यदि हां, तो फिर कण-कण में रामलला स्वयं विराजमान हो जाएंगे।
मनमोहनी मुक्तमंडी
क्या हिंदुस्तान को मुक्तमंडी बनाने के शिल्पकार डॉ. मनमोहन सिंह आर्थिक तारणहार की मसीहाई से गिरकर देश को बर्बाद करने वाले खलनायक बनने की कगार पर हैं? बीते ५ वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने घोटालों और अराजकता का इतना बड़ा बोझ अपने सिर पर लाद लिया है कि उनकी मुक्तमंडी के सारे समर्थक भी अब उनसे कन्नी काटने लगे हैं। जो सोनिया गांधी ५ साल पहले दुनिया के सबसे टिकाऊ राजनैतिक खानदान को सत्ता के साहिल पर उतारने के लिए मनमोहन सिंह को सबसे कामयाब पतवार मानती थीं, वह भी अब उनसे किनारा काटने की उचित युक्ति की तलाश में हैं। बीते ३ साल उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार की बांझ विरासत और राहुल गांधी के अनिश्चत भविष्य की कशमकश में ही बिताए हैं।
सशक्त विपक्ष की नामौजूदगी
आज किसी भी कांग्रेसी का नार्कोटेस्ट करा लिया जाए तो उसके मुंह से यही सच बाहर आएगा कि आज कांग्रेस मनमोहन सिंह की बर्बादी और बेहयाई की विरासत राहुल गांधी के अनिश्चय और अनिच्छा के दोपाट में पिसने को मजबूर है। उसे इससे उबारे कौन? सोनिया गांधी से कांग्रेसी अपेक्षा पाल रहे थे कि हो न हो ऐन मौके पर वह प्रियंका गांधी को चुनाव की फंसी बाजी में तुरुप के एक्के की तरह उतार सकती हैं। पर इस तुरुप के एक्के का दांव भी दामाद रॉबर्ट वड्रा पर लगे भूखंड घोटाले के चलते संदिग्ध है। घपले-घोटाले और अर्थव्यवस्था के निकले दिवाले के बीच भी अगर कांग्रेस किसी कारण आशा की रोशनी देख पाती है तो उसका एकमेव कारण है सशक्त विपक्ष की नामौजूदगी। बीते साल  भर की कवायद के बाद भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ यानी समान अवसर में प्रथम वाली श्रेणी तक तो ला पाई है, पर आज भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी के माथे पर चढ़ती त्यौरियों से नरेंद्र मोदी का सेंसेक्स डांवाडोल हो जाता है।
फिर आम आदमी के मन में सवाल भी खड़ा होता है कि क्या सचमुच नरेंद्र मोदी कांग्रेसी डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा सौंपी गई बर्बाद अर्थव्यवस्था से देश को उबार पाएंगे? उनकी अर्थनीति क्या होगी जिससे रुपया फिर से मजबूत हो जाए? बेरोजगारी घटे, महंगाई नियंत्रित हो, वृद्धि दर में इजाफा हो। कृषि क्षेत्र का कल्याण हो, उद्योगधंधे फिर से चलने लगें। निवेशकों का विश्वास बढ़े। चालू खाते का घाटा सचमुच घटे। हम आए दिन सोशल मीडिया पर ‘नमो-नमो’  का जाप सुनकर खुश जरूर होते हैं, पर अभी तक हमें वह तिलिस्मी चिराग नजर नहीं आया है जिससे चरमराई अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने की आशा जाग सके। अब तक मोदीवाद जिस अर्थतंत्र का पैरोकार नजर आ रहा है वह तो मनमोहनी मुक्तमंडी से अलग नजर नहीं आता। भले मेरी बातें कसैली लगें पर अब तक जो दिखाई  दे रहा है उसमें साफ नजर आता है कि मनमोहनी पूंजीवाद सट्टावाद का शिकार होकर ऐसे दौर में पहुंच चुका है जिस पर अब विश्वस्तरीय अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह का कोई नियंत्रण शेष नहीं। पूंजीवाद के मुनाफावादी मल्टीनेशनल मुनाफाखोरों ने दशक-दो दशक पहले जो दुर्दशा मैक्सिको, ब्रिटेन, मलयेशिया, हांगकांग इंडोनेशिया आदि की की थी लगभग वही दुर्दशा आज ‘राइजिंग इंडिया’ की कर दी है।
ढहता रुपया
रुपया सरपट ढहता जा रहा है। मोदी के पास क्या कोई विकल्प है जिससे हिंदुस्तान को बचाया जा सके? यदि सचमुच मोदी और उनकी  अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग कंपनी ‘एपको’ यह विकल्प अगले छह महीनों में देश को समझा सके तो इस देश का मध्यवर्ग भाजपा को १८२ के अब तक के अधिकतम लोकसभा सीटों के आगे पहुंचा सकता है। क्या मोदी के रणनीतिकार इस दांव को आजमाएंगे? या फिर १९९० वाले भाजपा के पुराने फॉर्मूले पर ही सीटों के इजाफे का दारोमदार छोड़ा जाएगा? १९९० में भाजपा का विस्तार रामजन्मभूमि के मुद्दे पर हुआ था। आज जब मैं यह लिख रहा हूं तब एक बार फिर मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या के जनपद फैजाबाद को सील कर रखा है। विश्व हिंदू परिषद के संत-महंत चातुर्मास में अयोध्या की ८४ कोस परिक्रमा पर अड़े हुए हैं। सोशल मीडिया में एक बार फिर मुलायम सिंह यादव को मुल्ला कहा जा रहा है। मोहम्मद आजम खां को धिक्कारा जा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता इसे सपा-भाजपा की नूरा कुश्ती करार दे रहे हैं।
हिंदूवादियों की शक-सुबहा
क्या सचमुच रामलला विश्वास कर पाएंगे कि विहिप वाले सचमुच उनका भव्य मंदिर बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं? आम हिंदूवादियों के मन में भी भव्य राममंदिर के निर्माण के प्रति विहिप के संकल्प को लेकर शक-सुबहा होना लाजिमी है। १९९२ में बाबरी विध्वंस के १० साल बाद २००२ में अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में आखिरी बार परमहंस रामचंद्र दास के नेतृत्व में राममंदिर आंदोलन हुआ था। अब तो शायद राम भक्तों को यह भी याद दिलाना पड़ेगा कि उसी आंदोलन से लौटती साबरमती एक्सप्रेस के कोच में गोधरा में आग लगाई गई थी। जिसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में दंगे हुए थे। जिन दंगों के दाग धोने की अपेक्षा बीते ११ वर्षों में तमाम भाजपा नेताओं ने भी पाली है।
आम हिंदू के मन में सवाल
आम हिंदू के मन में सवाल है कि विहिप को ८४ कोस की परिक्रमा के लिए १९९२-२०१३ तक २१ वर्षों का समय क्यों लगा? १९९८ से २००२ तक यानी पूरे ४ वर्षों तक उत्तर प्रदेश और केन्द्र में भाजपा का शासन था। अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया के मन में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के रामभक्त होने में रंचमात्र संदेह होने का कोई कारण नहीं। फिर उस अवधि में ८४ कोसी परिक्रमा कर रामलला का भव्य मंदिर बनाने का अभियान क्यों नहीं हुआ? हम यह सवाल पूछ रहे हैं सो स्वाभाविक है कि हमारे हिंदुत्व पर भी कुछ लोग संदेह करें पर इस संदेह से ज्यादा जरूरी है उन सवालों का जवाब जो हिंदू समाज जानना चाहता होगा। जब परमहंस रामचंद्र दास दिवंगत हुए तो उनकी चिता पर स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण होकर रहेगा। ११ वर्ष बीत गए स्वर्ग में परमहंस इंतजार कर रहे होंगे कब भाजपावाले अटल बिहारी वाजपेयी के शुभ संकल्प को पूरा करेंगे? इस ८४ कोस की परिक्रमा का फैसला प्रयाग के जिस धर्म संसद में हुआ वहां मौजूद संतों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कुंभ स्नान का निमंत्रण दिया था। हम लोग आज भी खुल्लमखुल्ला सद्भावना यात्रा में सिर पर गोल टोपी न लगाने के नरेंद्र मोदी के फैसले के समर्थन में भिड़ जाया करते हैं। पर आज दिन तक यह रहस्य नहीं समझ पाए कि आखिर कुंभ नहाने के निमंत्रण पर नरेंद्र मोदी ने गौर क्यों नहीं किया? माना कि उनको पाप प्रक्षालन की कोई जरूरत नहीं और वे बेहद पुण्यवान हैं, पर इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि अगर नमो वुंâभ में डुबकी लगा आते तो आज ८४ कोस की परिक्रमा पर निकले संत समाज के मन में राममंदिर निर्माण को लेकर बेहतर दृढ़ विश्वास होता। कुंभ बीता।
राम मंदिर का क्या?
भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनी। नरेंद्र मोदी के परमप्रिय सिपहसालार अमित शाह को राष्ट्रीय महासचिव की नियुक्ति के साथ-साथ उत्तर प्रदेश का सांगठनिक दायित्व मिला। अमित शाह पहली बार उत्तर प्रदेश के दौरे पर गए तो प्रदेशाध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के साथ उनका अयोध्या दौरा हुआ। अमित शाह और लक्ष्मीकांत वाजपेयी दोनों ने मीडिया के समक्ष कहा कि भाजपा राममंदिर का भव्य निर्माण कराना चाहती है। ये खबर अभी जवान भी नहीं हुई थी कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का जो बयान आया उसका संदेश यही था कि राम मंदिर मुद्दा भाजपा के एजेंडे में नहीं। राजनाथ सिंह कुंभ स्नान कर आए थे और उत्तर प्रदेश की राजनीति की उनकी समझ को लेकर शक करने का कोई मतलब नहीं। तो क्या मान लिया जाए कि राममंदिर मुद्दे में अब भाजपा को जिताने का दम नहीं या फिर भाजपा राममंदिर मुद्दे को राजनीति से बहुत ऊंचा मानती है। यदि राममंदिर मुद्दा सचमुच बहुत ऊंचा है तो भव्य राममंदिर के निर्माण की कार्ययोजना क्या?
८४ कोसी परिक्रमा
इस बयान के कुछ दिन बाद रामजन्मभूमि न्यास समिति के अध्यक्ष  महंत नृत्य गोपालदास के सम्मान में अयोध्या में उत्सव आयोजित था। उस कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी को निमंत्रित किए जाने की बात फिर सुर्खियों में आई। पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों के चलते नरेंद्र मोदी फिर अयोध्या नहीं गए। सो, विहिप की नीतियों का कट्टर समर्थन करने की पूरी इच्छा होने के चलते यह सवाल तो बनता है कि नरेंद्र मोदी यानी हमारे भावी कट्टर हिंदू प्रधानमंत्री क्या अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं? क्या विहिप की परिक्रमा को उनका नैतिक समर्थन प्राप्त है? या फिर बीते दशक भर में जिस तरह उनके और गुजरात विहिप के बीच में मतांतर रहा है वह कायम है। यदि मोदी यह मानते हों कि रामजन्मभूमि आंदोलन से भाजपा को दूरी बनाए रखनी चाहिए तो फिर उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी क्या केन्द्रीय नेतृत्व को विश्वास में लिए बिना ही विहिप की ८४ कोसी परिक्रमा को रोज समर्थन देनेवाला बयान जारी कर रहे हैं। भाजपा में अगर कोई केन्द्रीय नेतृत्व की नीतियों से हट कर बयान देता है तो उसके प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन यह दारोगानुमा बयान देने में जरा भी देर नहीं करते कि ‘पार्टी अध्यक्ष उक्त नेता के बयान पर उचित कार्यवाही करेंगे।’ अब तक मेरी नजर लक्ष्मीकांत वाजपेयी के इस ‘सांपद्रायिक’ वक्तव्य पर शाहनवाज हुसैन के किसी बयान पर नहीं गई है।
उद्धव ठाकरे का जवाब
हमने बात शुरू की थी मनमोहन की मुक्तमंडी के महामंदी में फांस से। जब शिवसेना के पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे दिल्ली दौरे पर गए थे तब उनसे एक पत्रकार ने सवाल पूछा कि अयोध्या में राममंदिर के भव्य निर्माण पर शिवसेना की क्या भूमिका है? शिवसेना पक्ष प्रमुख का जवाब था- ‘राममंदिर तो बनना चाहिए, पर उससे कहीं ज्यादा जरूरी है आम आदमी के रोजी-रोटी का सवाल।’ मुक्तमंडी के विफल होने से, रुपए के धराशाई होने से आम आदमी की रोटी का सवाल जटिल हो रहा है। बाबरी के गिरने से हिंदुस्तान को उतना नुकसान नहीं हुआ था जितना रुपए के गिरने से होने जा रहा है।

भोजन या वोटों का जुगाड़ है फूड बिल?



दिल्ली में कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने खाद्य सुरक्षा योजना का उद्घाटन किया था। इसके तहत गरीबों को सस्ता अनाज मिलेगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या दिल्ली के गरीबों को इसका लाभ मिल पाएगा? इस महत्वकांक्षी योजना को लेकर आखिर वो क्या सोचते हैं जिनके लिए ये पूरी कवायद की जा रही है। क्या सचमुच खाद् सुरक्षा योजना गरीबों को फायदा पहुंचाने की गंभीर कोशिश है या फिर महज वोट बटोरने का जरिया?
आईबीएन7 इस सवाल का जवाब ढूंढने जा पहुंचा गरीबों की बस्ती में। राजधानी दिल्ली में यमुना किनारे बनी झुग्गियों में लगभग 5 हजार लोग रहते हैं। ये या तो मजदूर हैं या फिर सब्जी, फल-फूल बेचकर गुजर बसर करने वाले। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद डेढ़ से 2 सौ रुपए ही कमा पाते हैं। 15 -20 सालों से ये परिवार इन्हीं झुग्गियों में रहते हैं और ये वो लोग हैं जिनके लिए सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की कवायद में जुटी है। दिल्ली की शीला सरकार तो जल्द-जल्द से ये योजना लागू करना चाहती है। इस योजना के तहत सरकार इन लोगों को हर महीने प्रति व्यक्ति 5 किलो राशन देने की बात कर रही है। सवाल ये कि क्या इससे इनका गुजारा हो पाएगा?
गरीब बस्तियों में रहनेवाली शीला से एक सवाल पूछा गया तो उसने कहा कि चार किलो गेंहूं और एक किलो चावल में नहीं खा सकते हैं। गौरतलब है कि झुग्गियों में रहनेवाले लोग सिर्फ गरीब नहीं हैं। बल्कि ये वोटर भी हैं और ये वो लोग हैं जो ईमानदारी से पोलिंग बूथ पहुंचते हैं। इसे इत्तेफाक कहिए या राजनीति, मगर इस साल के अंत तक दिल्ली में चुनाव भी हैं तो क्या 2 रुपए किलो गेंहूं और 3 रुपए किलो चावल का वायदा गरीब की भूख मिटाने का हिस्सा है या फिर महज ये वोट के जुगाड़ का किस्सा है? खैर ये तो वक्त ही बताएगा मगर हमने ये सवाल झुग्गी के बाशिंदों से पूछा कि ये अनाज उनके पेट तक पहुंचेगा?
झुग्गी में रहनेवाली शकुंतला ने बताया कि जब जरूरत होती है तो आते हैं। ये सब चुनाव को लेकर हो रहा है वोट चाहिए तो आ रहे हैं। अब इस जवाब के बाद ये तय करना बड़ा मुश्किल होता है कि किसकी भूख हावी हो रही है? बहरहाल, उम्मीद तो अच्छे की ही करनी चाहिए।

Thursday, 22 August 2013

होगा आदिवासियों का भला ?




सच्चर कमेटी की तर्ज पर आदिवासियों के उत्थान के लिए भी एक कमेटी का गठन कर दिया है। लेकिन, यह एक ईमानदार पहल कदमी के बजाय छलावा ज्यादा लगती है। एक ऐसा छलावा, जो शुरुआत में झूठी उम्मीदें पैदा करता है। देश मेंअनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान व विकास के लिए केन्द्र सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति के गठन का फैसला किया है। आदिवासी समुदायों के विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियों को केन्द्र में रखते हुए प्रस्तावित उच्च स्तरीय समिति मुख्यत: इस वर्ग की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व स्वास्थ्य आदि की स्थितियों का गहन अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके आधार पर आदिवासी समुदाय के सम्पूर्ण भावी विकास की रूपरेखा तैयार की जा सकेगी।
उच्चस्तरीय समिति अनुसूचित जनजातियों के लिए नीतियों के निर्धारण का सुझाव देगी। यह उच्च स्तरीय समिति आदिवासी मामलों के मंत्रालय के अधीन रहेगी। प्रोफेसर वर्जीनियस खाखा की अध्यक्षता में इस समिति के अन्य सदस्य हैं, डॉ. उषा रामनाथन्, डॉ. जोसेफ बारा, डॉ. के.के. मिश्रा, डॉ. अभय बंग, व सुश्री सुशीला बसंत। आदिवासी मंत्रालय के सचिव इस समिति के सदस्य सचिव होंगे, जबकि सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद की पूर्व सदस्य व सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय इस समिति की प्रमुख कर्ता-धर्ता होंगी। आदिवासी समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व स्वास्थ्यगत स्थितियों का विहंगम अध्ययन कर उच्च स्तरीय समिति नौ महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। केंद्र व राज्य सरकार के विभिन्न विभागों से आदिवासियों की दशा पर आधिकारिक आंकड़े जुटाने के साथ ही यह समिति विशेष रूप से राज्य, क्षेत्र व जिला स्तरों पर उनकी दशा-दिशा जानने-समझने के लिए प्रकाशित लेखों, शोधपत्रों, आंकड़ों, साहित्य आदि का गहन अध्ययन करेगी।
कोई हैरत की बात नहीं यदि आदिवासियों की स्थिति सुधारने के लिए बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट भी इसी अंजाम को प्राप्त हो। आखिर ऐसा क्या है, जो आदिवासियों की हालत के बारे में छिपा हो। उनकी समस्याएं जगजाहिर हैं और उनके समाधान तलाशने के लिए नया शोध नहीं करना होगा। वैसे भी कमेटी उपलब्ध जानकारियों तथा आंकड़ों के पर ही निष्कर्ष निकालेगी और सिफारिश करेगी। उसे कुछ भी नया नहीं करना है। वह ये काम तीन महीने में भी कर सकती थी, जिसके लिए उसे नौ महीने दिए गए हैं।

वास्तव में सरकार अगर समचमुच में ईमानदार होती, तो इस कवायद में वह उन लोगों को शामिल करती जो जल, जंगल और जमीन से जुड़े मसलों पर वर्षों से काम कर रहे हैं। वे जमीनी हकीकत से उसे रूबरू करवा देते। सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों में कहां क्या खोट हैं, उनसे बेहतर कौन बता सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि ये उसके लिए खतरनाक हो सकता है। उनके जरिए वह भयानक तस्वीर सामने आ सकती है, जिससे वह मुंह चुराती रही है। दरअसल, कांग्रेस इस बात से घबराई हुई है कि उसकी छवि आदिवासी विरोधी बनती जा रही है। देश भर में यह धारणा मजबूत हो रही है कि उसे आदिवासियों की कोई चिंता नहीं है और वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं कॉरपोरेट जगत के हितों के लिए काम कर रही है। यह उसकी वर्तमान एवं भावी राजनीति के लिए बहुत ही नुकसानदेह है। पहले ही वह आदिवासियों में अपना जनाधार गंवाती जा रही है और भाजपा का प्रभाव उनमें बढ़ता जा रहा है। ऐसे में अगर उसने समय रहते कुछ न किया तो वह सिमटती चली जाएगी। इसी चिंता के चलते कमेटी का तिलिस्म रचा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि वह उन नीतियों को बदलने के बारे में नहीं सोचती, जिनसे उसके जनाधार का क्षरण हो रहा है।  उच्च स्तरीय समिति अपने कार्य को तय समय-सीमा के भीतर सम्पन्न कर सके, इसके लिए सरकार के विभिन्न मंत्रालय व एजेंसियां अपना सम्पूर्ण सहयोग देंगी। आदिवासियों व उनसे संबंधित मुद्दों पर भूरिया समिति, मुंगेकर समिति व राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा प्रदत्त जो भी रिपोर्ट सरकार के पास हैं, वे इस उच्च स्तरीय समिति को उपलब्ध कराई जाएंगी। आदिवासी मामलों से संबंधित मौजूदा आंकड़े भी इस समिति को दिए जाएंगे।
जनजातिय मामलों के मंत्रालय ने सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण पर गठित स्थायी समिति की जनजातियों के लिए चलाई जा रही शैक्षिणिक उत्थान योजनाओं से संबंधित रिपोर्ट में राज्य सरकारों की दायित्वहीनता एवं केन्द्र सरकार निष्क्रियता साफ झलक रही है। समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि जनजातियों के शैक्षणिक उत्थान के लिए चलाई जा रही एकलव्य मॉडर्न रिहायशी स्कूलों की स्थापना की परियोजना के अंतर्गत मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों के लिए 100 स्कूल मंजूर किये थे, उनमे से केवल 79 स्कूल ही कार्यरत है । शेष 21 स्कूल शुरु ही नही हुए यहां तक कि उनमें से चार स्कूल जनजाति बहुल आसाम एवं मेद्यालय से दूसरे राज्यों मे स्थान्तरित कर दिये गये। कमेटी ने पाया की राज्य सरकारों की गैर जिम्मेदारी एवं उदासीनता के कारण यह स्कूल स्थापना का कार्य समय से नही हो सका और अब कहा है कि मंत्रालय अनिर्मित सभी स्कूलो को 2 वर्ष के भीतर शुरु करने के लिए राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश जारी करें। समिति ने कहा है कि 2004.05 से 2007.08 में मंत्रालय द्वारा उत्तर -मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए अरुणाचल प्रदेश, बिहार, दमन दीव के लिए जो वित्तीय मदद नही दी गई उसे तुरंत जारी किया जाये। कमिटी मंत्रालय के इस जवाब से असंतुष्ट थी कि संबंधित राज्य द्वारा वित्तीय मांगो के प्रस्ताव नही भेजे थे। कमेटी के सामने सरकार ने अपने जवाब में कहा था, मंत्रालय ने 2007-08 के दोहराने संबंधित राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को कई बार लिखित स्मृति पत्र भी भेज चुकि है लेकिन राज्य सरकारों ने आवश्यक कार्यवाही नही कि, इसे कमेटी ने खारिज कर दिया तथा कहा कि मंत्रालय को आदिवासी छात्रों के लिए राज्य सरकारों पर आवश्यक दवाब बनाये ताकि उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। एवं इन कारणों का भी पता लगाये जिनके कारण राज्य सरकारे समय-समय पर प्रतिवेदन क्यों नही दे पाती है। शत प्रतिशत केन्द्र सरकार द्वारा संचालित उत्तर मैट्रिक छात्रवृति योजना के ठीक क्रियान्वयन नही होने के पीछे सरकार का तर्क है की वित्तीय रुप से पिछड़े अनुश्चिित जनजाति के छात्र छात्रवृति के लिए आवेदन नही करते है इसे कमेटी ने सिरे से खारिज कर दिया तथ टालने के रवैये की कड़ी आलोचना की है। स्थयी समिति ने अपनी अगली सिफारिश के संदर्भ में मंत्रालय से आये जवाब मे कि असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड़ से इस छात्रवृति पर खर्च एवं उपयोग प्रमाण पत्र नही मिलने के कारण इनकी वित्त पूर्ति पर रोक लगा दी गई थी लेकिन कमेटी ने इससे नाराजगी जताते हुए कहा कि इसके खच्र का सुनिश्चित करते हुए यह ध्यान दिया जाये कि निर्धारित योजना का पैसा उसी योजना पर खर्च किया जाये किसी अन्य योजना मे यह डाइवर्ट नही किया जाएं। 2004-05, 2005-06 और 2006-07 में अप ग्रेजुएशन आफ मेरिट आफ एसटी स्टूडेंट स्कीम के अंतर्गत लाभार्थियों की संख्या कई राज्यों में नही के बराबर है एवं 2007-08 में उत्तर प्रदेश में तो इस योजना के अंतर्गत किसी को भी लाभ नही दिया गया यह दशा मंत्रालय की अनदेखी एवं राज्य सरकारों की जनजातियों के शैक्षणिक विकास के प्रति उदासीनता को उजागर करती है।

फूड बिल लटका




मौजूदा संसद सत्र में खाद्य सुरक्षा बिल को हर हाल से पारित कराने के लिए बेचैन यूपीए सरकार की राह के रोड़े फिलहाल कम होते नहीं दिख रहे हैं। मंगलवार को बीजेपी ने कोयला घोटाले की फाइलें गायब होने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग करते हुए दोनों सदनों में जमकर हांगामा काटा, जिसकी वजह से राजीव गांधी के जन्मदिन पर खाद्य सुरक्षा बिल पर लोकसभा में चर्चा शुरू करने के कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फिर गया। कांग्रेस की कोशिश थी कि गुरुवार को इस पर बात आगे बढ़ाई जाए, लेकिन यह परवान नहीं चढ़ सकी। 11 सांसदों को निलंबित करने के संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ के प्रस्ताव पर भारी हंगामे की बीच लोकसभा की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी गई।

कांग्रेस की मुश्किल यह है कि उसे मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी के साथ-साथ तेलंगाना के प्रस्ताव का विरोध कर रहे सीमांध्र के अपने सांसदों और टीडीपी से भी निपटना है। गुरुवार को संसदीय कार्यमंत्री ने लोकसभा में इस सत्र में हंगामा करने वाले टीडीपी के चार और कांग्रेस के सात सांसदों को मौजूदा सत्र की कार्यवाही से निलंबित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन यह दांव भी फिलहाल उल्टा पड़ता दिख रहा है। बीजेपी इन सांसदों के बचाव में आ गई और प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उनकी पार्टी सांसदों के निलंबन के खिलाफ है। उन्होंने कहा, 'हम तेलंगाना राज्या बनाए जाने के पक्ष में हैं, लेकिन जिस अनुचित तरीके से कांग्रेस ने इसकी घोषणा की है उसी की वजह से इसका विरोध हो रहा है। एनडीए के शासन काल में भी राज्य बनाए गए थे लेकिन कोई विरोध की आवाज नहीं आई। कांग्रेस ने गैरजिम्मेदाराना तरीके से राज्यों का बंटवारा किया और यही वजह है कि उनके अपने सांसद भी विरोध कर रहे हैं।'

Friday, 16 August 2013

साधु यादव ने की मोदी से मुलाकात




आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर देश में राजनीतिक सरगर्मी तेज़ हो गई है और इस बीच बिहार में कांग्रेस के नेता साधु यादव ने बीजेपी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है.साधु यादव राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के साले हैं, ऐसे में उनकी मोदी से मुलाकात खास हो जाती है. मोदी से मिलने वालों में बिहार के चर्चित नेता साधु यादव अकेले नहीं थे, बल्कि कांग्रेस के एक अन्य नेता दसई चौधरी भी उनके साथ थे. मोदी और साधु यादव की मुलाकात गांधी नगर में हुई है. साधु यादव ने अपनी मुलाकात की पुष्टि की है, लेकिन उसे शिष्टाचार मुलाकात कहा है. दोनों नेताओं के बीच करीब 45 मिनट तक बातचीत हुई. हालांकि, बातचीत क्या हुई है इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है. अगले साल लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं ऐसे में मोदी से साधु यादव की मुलाकात के मायने समझना बहुत मुश्किल नहीं है.

वैसे राजनीति में हर नए रिश्ते की शुरुआत शिष्टाचार मुलाकात से ही होती है.साधु के मोदी से इस मुलाकात को काफी तरजीह दी जा रही है और बिहार की राजनीति में इसे एक भूकंप के तौर पर देखा जा रहा है.बिहार में कांग्रेस की स्थिति काफी कमज़ोर है और ऐसे में उस पार्टी के दो नेताओं का मोदी से मिलना बहुत कुछ कहता है.वैसे बिहार में जेडीयू सरकार से बीजेपी के अलग होने के बाद वहां की राजनीति काफी गर्म है और ऐसे में साधु-मोदी की मुलाकात काफी अहम हो जाती है.