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Wednesday, 19 June 2013

गौरीकुंड से करीब 5000 लोग लापता

 
-ट्रेकिंग पर 40 लोग फंसे हुए हैं जिनमें विदेशी भी शामिल हैं। आज लगातार दूसरे दिन मौसम खुला है ,उम्मीद है कि आज राहत कार्यों में तेजी आएगी। आज 6 और हेलीकॉप्टर राहत कार्यों में लगाए जाएंगे। यानी कुल 16 हेलीकॉप्टर राहत कार्य में लगेंगे।
उत्तराखंड में जगह-जगह लोग फंसे हुए हैं। टिहरी में ऐसे ही कुछ सैलानियों को बचाया गया। ये सैलानी गंगोत्री की यात्रा से वापस लौट रहे थे तभी बारिश और बाढ़ की चपेट में आकर बीच रास्ते में फंस गए। ये लोग मुख्य रास्ते पर एक पुल के बह जाने के बाद पानी से घिर गए थे। सेना के जवान और पुलिसवालों ने इन लोगों को रस्सी और टोकरी की मदद से बाहर निकाला। इन सभी को टिहरी के आपदा बचाव केंद्र में पहुंचाया गया है। जहां से इन्हें आगे भेजा जाएगा। बताया जा रहा है कि अभी भी 70-80 से लोग फंसे हुए हैं। प्रशासन उन्हें निकालने के इंतजाम कर रही है।
उत्तराखंड में बारिश से भारी तबाही मची है। सेना और आईटीबीपी से जवानों ने मोर्चा संभाल लिया है। लेकिन जो तस्वीर उभरकर आ रही है वो बेहद दर्दनाक है। आईटीबीपी और एनडीआरएफ चार हजार लोगों को बचाया है। आईटीबीपी के तीन से चार बटालियन काम कर रहे हैं। आईटीबीपी ने 6400 लोगों को आश्रय दिया है। 11 हजार 400 लोगों को बजाया था। पांच हजार को आर्मी ने रेस्क्यू किया गया। 7 हजार लोग अभी भी फंसे हुए हैं। गौरी कुंड से गुप्त काशी तक लाया जा रहा है। कंट्रोल सेंटर बद्रीनाथ में बनाया गया है। उत्तराखंड के सीएम के बात कर रहा हूं। आज वो केदारनाथ गए हैं। फूड पैकेट दिए जा रहे हैं। हेलिकॉप्टर से निकालने का प्रयास जारी है। सशस्त्र सीमा बल आकादमी (SSB) को करीब 100 करोड़ का नुक्सान हुआ है। उफनती अलकनंदा ने 2 महीने पहले 4 करोड़ की लागत से बने अधिकारी प्रशासक केंद्र को भी तबाह कर दिया है। यहां अलकनंदा की एक धारा ने आपनी दिशा भी बदल दी है। नदी धारा SSB की ओर ले बहने लगी है। अलकनंदा द्वारा मचाई गई तबाही का आलम यह है कि SSB के बद्री स्टेडियम के साथ ही रिक्रूटों की बैरकों का तो नामोनिशान ही मिट गया। सड़कें टूटी हुई हैं, कई जगहों पर लैंडस्लाइड हुआ है। 100 से ज्यादा शव बरामद किए जा चुके हैं और 200 से ज्यादा लोगों के मरने की आशंका है। अब भी 1000 से ज्यादा लोग लापता हैं।

कितना लाभ मिलेगा नीतीश को?



नीतीश ने बिहार की जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि मोदी विरोधी स्टैंड के कारण वो भारी सेक्युलर है। लेकिन इस रुख का लाभ नीतीश को मिलेगा इसमें भारी संदेह है। उसके कई कारण है। बिहार में अभी भी मुस्लिम मतदाता लालू यादव को ज्यादा विश्वसनीय मानता है। उसका कारण है। 1990 में एलके आडवाणी के रथ को बिहार के समस्तीपुर में लालू यादव ने ही रोका था। हाल ही में महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र में हुए चुनाव में मुस्लिम मत लालू यादव को पड़े। नीतीश कुमार के लगातार नरेंद्र मोदी विरोधी स्टैंड का कोई लाभ महाराजगंज में उनकी पार्टी को नहीं मिला। उल्टे भारी नुकसान हुआ। अगड़ी जातियां नीतीश के नरेंद्र मोदी विरोधी रुख के कारण या तो शिथिल हो गई या नीतीश को सबक सिखाने के लिए राजद को वोट कर आयी।

बिहार के मुस्लिम मतदाताओं को अभी भी ये लगता है कि भाजपा से संबंध विच्छेद के बाद भी आज नहीं तो कल नीतीश कुमार फिर भाजपा से दोस्ती करेंगे। इसका कारण नीतीश कुमार की अवसरवादी राजनीति है। अपने राजनीतिक जीवन में नीतीश ने अपने फायदे के लिए अपने पुराने दोस्तों को छोड़ा नए दोस्त बनाए। मुस्लिम मतदाताओं को पता है कि नीतीश कुमार तब भी राजग के मंत्रिमंडल में मौजूद रहे जब गुजरात में भीषण दंगे हुए थे।

बिहार की जनसंख्या का भूगोल भी नीतीश कुमार के पक्ष में नहीं है। पूरे बिहार में नीतीश कुमार को भारी सफलता इसलिए मिली की कांग्रेस के परंपरागत समर्थक ऊंची जातियां जो फिलहाल भाजपा में है, वो पूरे राज्य में गठबंधन की स्थिति में नीतीश के साथ आए है। लेकिन गठबंधन टूटने की स्थिति में ऊंची जातियों की स्वाभिवक पसंद भाजपा होगी। इसमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और बनिया शामिल है। महाराजगंज में भी नरेंद्र मोदी का लगातार विरोध से नाराज ऊंची जातियों ने नीतीश को सबक सिखाने के लिए राजद को वोट दिया।

लालू यादव ने इस सच्चाई को स्वीकार किया कि ऊंची जातियों का एक बड़ा तबका महाराजगंज में उन्हें वोट किया। ऊंची जातियों के हटने के बाद नीतीश को सबसे बड़ी चुनौती पिछड़े समाज से मिलेगी, जिसके वोटिंग पैटर्न को मुस्लिम मतदाता नजदीक से देख अपना वोटिंग का फैसला लेता है। बिहार में नीतीश कुमार की जाति कुर्मी सिर्फ छह जिलों में ही मजबूत स्थिति में है। जबकि लालू यादव की जाति बिहार के सभी जिलों में एक अच्छी संख्या लिए बैठे है। जिस अति पिछड़ा वोट पर नीतीश भारी विश्वास कर रहे है, वो अभी भी जिलों के स्थानीय समीकरण के हिसाब भाजपा, लालू यादव और नीतीश के बीच बंटा है। इन परिस्थितियों का लाभ लालू यादव को सबसे ज्यादा मिलेगा।

बिहार में एक सफल मुस्लिम यादव समीकरण पूरे राज्य में बनता है। जबकि कुर्मी-मुस्लिम समीकरण बिहार के छह जिलों में सिमट जाएगा। वैसे भी अगर मुस्लिम मतदाताओं को अगर यह लगेगा कि ऊंची जातियों का वोट नीतीश बजाए भाजपा की तरफ जा रहा है तो वे नीतीश को वोट देकर अपना वोट खराब नहीं करेंगे। उनकी स्वभाविक पसंद लालू यादव होंगे। दिलचस्प स्थिति दलित वोटों की है। पासवान बिरादरी पूरे राज्य में नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल बैठा है। जबकि महादलित वोट बंट गया है। ये भाजपा, नीतीश और लालू के पास स्थानीय समीकरणों के हिसाब से जाएगा। महादलित अपने इलाके में दबंग बिरादरियों के रूख को देखते है। अगर इलाके में यादव दबंग है तो महादलित यादवों के साथ हो जाते है। अगर इलाके में ऊंची जाति के लोग दबंग है तो महादलित उनके साथ जाते है।

Sunday, 16 June 2013

मोदी ने जब चाहा शिकार किया



नरेंद्र मोदी को बीजेपी की गोवा कार्यकारिणी में चुनाव अभियान समिति की कमान दिए जाने से के साथ ही ना सिर्फ बीजेपी बल्कि एनडीए में भी भूचाल आ गया है। पहले तो लालकृष्ण आडवाणी ने बगावत की और फिर एनडीए का 17 साल पुराना साथी जेडीयू भी अलग हो गया। इन सबसे बावजूद मोदी के तेवरों में नरमी नहीं दिखती। इतिहास बतात है कि मोदी ने कभी हार नहीं मानी है और जब चाहा जिसका शिकार किया। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं। गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 2014 में बीजेपी के चुनाव प्रचार की कमान नरेंद्र मोदी के हाथ आ गई है। इसके साथ ही बीजेपी में लालकृष्ण आडवाणी के पीएम पद के उम्मीदवार बनने की सारी संभावना खत्म हो गई है। माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने ही वो पृष्ठभूमि तैयार की जिसने आडवाणी को बीजेपी के अतीत पुरुषों की जमात में खड़ा कर दिया।


कभी बीजेपी के लौह पुरुष कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से कभी अनुपस्थित नहीं रहे लेकिन जून के पहले हफ्ते में हुई गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान उनका पेट खराब हो गया। सियासी जानकारों का मानना था कि पेट खराब होने से कहीं बड़ी वजह गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी का छा जाना था। लालकृष्ण आडवाणी कई बार इशारा कर चुके थे कि उन्हें शिष्य से प्रतिद्वंद्वी बन चुके नरेंद्र मोदी की बड़ी हैसियत स्वीकार नहीं। वहीं गोवा में पार्टी के हर कोने से नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनाव के लिए पीएम पद का प्रत्याशी बनाने की मांग उठ रही थी। ऐसी मांग गोवा से दूर दिल्ली में आडवाणी के घर के बाहर भी सुनाई दे रही थी।
वाघेला भी बने शिकार
एक बयान में वाघेला ने 1996 की घटना की याद दिलाई। वाघेला ने केशूभाई सरकार में मोदी के सुपर सीएम की तरह के बर्ताव से नाखुश होकर बगावत कर दी थी। गांधी नगर पहुंचे अटल बिहारी वाजपेयी ने समझौता फार्मूले के तहत सुरेश मेहता को सीएम बनवा दिया। वाघेला कहते हैं-'उस वक्त मोदी समर्थकों ने अटल जी की कार को रास्ते में रोक लिया था। वो नारेबाजी कर रहे थे। प्रदर्शन की वजह से वाजपेयी की फ्लाइट छूट गई। इसीलिए हाल ही में आडवाणी के घर हुई नारेबाजी से मैं हैरान नहीं हुआ। यहां तक कि आडवाणी को भी कोई शक नहीं होगा कि नारेबाजी के पीछे कौन है।'
राजनाथ भी पढ़ते हैं कसीदे
बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी ये स्वीकार कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी पार्टी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। उन्हें ये मुकाम चमत्कार से नहीं मिला है। संघ के फुलटाइम प्रचारक से सीएम तक के 40 साल लंबे सफर में मोदी ने अपना सियासी करिअर नफासत से तराशा। समर्थक और विरोधी दोनों कहते हैं कि मोदी जज्बाती नहीं हैं। वो इस्पाती इरादे वाले सख्त प्रशासक और राजनेता हैं जो जानता है कि वो क्या चाहता है, और उसे कैसे हासिल करना है।
समाजशास्त्री और स्तंभकार विद्युत जोशी कहते हैं कि वो हर एक को कुचल कर आगे चले जाते हैं तो आपको समझना होगा कि मोदी की राजकरण की शैली क्या है। मोदी की राजकरण की स्टाइल को समझना है तो आपको इंदिरा गांधी को समझना होगा। इंदिरा ने भी सब पुराने लोगों को निकाल दिया, मोदी ने भी निकाल दिया। कहा जाता है कि इंदिरा आलोचना बर्दाश्त नहीं करती थीं, विरोधियों के लिए खड़ा होने की जगह नहीं छोड़ती थीं। मोदी में सियासी शिकारी के ये गुण कूट-कूट कर भरे हुए नजर आते हैं। कहते हैं उनके सियासी शिकारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। ताजा शिकार नीतीश कुमार हैं। लाल कृष्ण आडवाणी को बीजेपी के इतिहास में जगह मिल चुकी है। संजय जोशी पार्टी के हाशिए पर चले गए हैं। बीजेपी से अलग होकर गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाने वाले केशुभाई पटेल अप्रासंगिक हो चुके हैं।
आडवाणी की ख्वाहिश का निकला दम
गोवा कार्यकारिणी में बीजेपी ने 2014 की कमान नरेंद्र मोदी को सौंप दी। पीएम पद का दोबारा प्रत्याशी बनने की आडवाणी की ख्वाहिश का दम निकल गया। शिकारी का ये खेल दिलचस्प है। दिलचस्प ये भी है कि 11 साल पहले यही गोवा था, यही आडवाणी थे, जिन्होंने मोदी को बीजेपी से निष्कासित होने से बचाया था। गुजरात दंगों की वजह से 2002 में गोवा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को निष्कासित करने की तैयारी कर चुके थे लेकिन आडवाणी बीच में आ गए। वाजपेयी को झुकना पड़ा।
आज नरेंद्र मोदी-आडवाणी के प्रतिद्वंद्वी हैं, कभी वो आडवाणी के शिष्य कहे जाते थे। दरअसल, 1984 में दो सीट मिलने के बाद आडवाणी ने पार्टी की राज्य इकाइयों में संगठन सचिव के पद को फिर मजबूत किया। गुजरात में मोदी संगठन सचिव बने। उन्होंने 1987 में आडवाणी की न्याय यात्रा, 1989 में लोकशक्ति यात्रा, 1990 में अयोध्या रथ यात्रा को सफल बनाने में जी-तोड़ मेहनत की।
मोदी को मिला इनाम
नरेंद्र मोदी को इनाम के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी जिम्मेदारी मिली। मुरली मनोहर जोशी ने बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर कन्याकुमारी से श्रीनगर तक तिरंगा फहराने के लिए अखिल भारतीय एकता यात्रा की। इसका प्रबंधन मोदी को मिला, जो जबरदस्त प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन कर बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति पर छा गए। बीजेपी में मोदी का उदय हो चुका था। आडवाणी उनके साथ थे।
वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला कहते हैं कि संजय जोशी का मामला हो, सुरेश मेहता का मामला हो, कांशी राम राणा का मामला हो या केशुभाई पटेल का मामला, हर जगह आडवाणी जी और अटल जी मोदी के साथ खड़े रहे, उन्होंने कहा कि ये हमारा भविष्य है।
वाघेला को लगाया ठिकाने
इसके बाद सियासत में 10 साल सीनियर गुजरात बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष शंकर सिंह वाघेला से मोदी का टकराव शुरू हो गया। जूनियर होने के बावजूद मोदी ने एक तुरुप चाल चल कर पार्टी में उनका कद कम कर दिया। कहते हैं कि 1991 में आडवाणी को गांधी नगर से चुनाव लड़ने की सलाह मोदी ने ही दी थी। इस सीट से शंकर सिंह वाघेला लड़ते थे लेकिन नई दिल्ली सीट से राजेश खन्ना के कांग्रेस प्रत्याशी बनने के बाद आडवाणी सेफ सीट तलाश रहे थे। मोदी की ये तुरुप चाल थी क्योंकि तब बेहद लोकप्रिय आडवाणी के गुजरात में आने से कार्यकर्ता उत्साह में भर गए। शंकर सिंह वाघेला पिछड़ते गए।
शंकर सिंह वाघेला मोदी के पहले सियासी शिकार बने जब 1996 में उन्हें पार्टी से जाना पड़ा। 2001 में गुजरात भूकंप के आधे-अधूरे राहत कार्य और दो उप चुनाव में हार की वजह से केशुभाई की गुजरात के सीएम के तौर पर विदाई हो गई। कहते हैं अक्टूबर 2001 में आडवाणी की वजह से ही मोदी चुनाव लड़े बिना ही सीएम बन गए। एक के बाद एक चुनावी सफलता से उनकी सियासी महत्वाकांक्षा बढ़ती गई। तभी पाकिस्तान यात्रा के दौरान आडवाणी ने जिन्ना को सेकुलर करार दिया। यहीं से रिश्ते में दरार पड़ने लगी।
आडवाणी के खिलाफ मोदी
2005 में जिन्ना पर दिए आडवाणी के बयान की आरएसएस-बीजेपी में जबरदस्त आलोचना हुई। आडवाणी के समर्थन में मोदी नहीं आए, करीब तीन महीने बाद आडवाणी को अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। 2011 में आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ पोरबंदर से यात्रा निकालना चाहते थे लेकिन मोदी ने सद्भावना यात्रा शुरू कर दी। आडवाणी ने अपनी यात्रा मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार के प्रदेश बिहार से की।
गोवा कार्यकारिणी से पहले बीजेपी में मोदी को पीएम बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। आडवाणी ने मोदी की दावेदारी को कमजोर करने की आखिरी कोशिशें कीं। ग्वालियर में कहा कि जैसे अटल बिहारी वाजपेयी विकास की कई योजनाओं को लागू करने के बाद भी नम्र बने रहे और घमंड से दूर रहे, उसी तरह शिवराज सिंह चौहान ने भी मध्यप्रदेश जैसे "बीमारू" राज्य की तस्वीर बदल दी। 2009 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में मिली हार के बाद संघ भी मानने लगा था कि पार्टी को नए चेहरे की जरूरत है। इस सोच ने मोदी को मजबूत कर दिया। आखिरकार गोवा में आडवाणी उनके ताजा सियासी शिकार बन गए।
मोदी का रास्ता हुआ साफ
नरेंद्र मोदी को बीजेपी की कमान मिली तो जेडीयू ने सेकुलरवाद का झंडा बुलंद कर बीजेपी से नाता तोड़ लिया। नीतीश कुमार बिहार में अकेले रह गए हैं। उन्हें बीजेपी के अगड़े वोटों का फायदा नहीं मिल पाएगा। साथ ही एनडीए से नरेंद्र मोदी को चुनौती देने की हैसियत रखने वाला नेता भी बाहर हो गया है यानी पीएम प्रत्याशी के सवाल पर अब न तो बीजेपी में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाला कोई बचा, न एनडीए में। वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत कहते हैं कि बिहार की राजनीति के जो ताजा हालात हैं, ऐसा होना ही था, क्योंकि नीतीश कुमार समाजवादी छवि के माने जाते हैं और नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगभग डेढ़ साल से बोल रहे थे। उनकी पार्टी नहीं चाहती थी कि वो किसी ऐसे फ्रंट के संयोजक बने, जिसके नेता मोदी हों।
नीतीश ने लिया मोर्चा
जानकारों का मानना है कि नरेंद्र मोदी अच्छी तरह समझते थे कि नीतीश सेकुलर वोट खोने का खतरा नहीं उठा सकते। मई 2009 में लुधियाना में एनडीए की रैली में मोदी और नीतीश मंच पर साथ-साथ दिखे, तो ये तस्वीर बिहार में बार-बार दिखने लगी थी। नीतीश को ये नागवार गुजरा। ये तस्वीर जितनी दिखती, उनके सेकुलर वोट में उतनी ही सेंध लगती। यही वजह है कि 2009 के आम चुनाव में नीतीश ने बिहार में मोदी को प्रचार के लिए बिहार आने से मना कर दिया।
12 जून 2010 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले अखबारों में लुधियाना रैली की नीतीश-मोदी की तस्वीर छपी। इससे नीतीश कुमार इतने नाराज हुए कि गठबंधन तोड़ने की बात तक सोचने लगे। इसी के बाद 2010 के विधानसभा चुनाव में भी नीतीश ने मोदी के प्रचार के लिए मना कर दिया। जून 2012 में नीतीश ने ये बयान भी दिया कि बीजेपी को सेकुलर छविवाले नेता को ही पीएम पद का प्रत्याशी चुनना चाहिए।
बीजेपी में सेकुलर छवि वाले नेता को पीएम प्रत्याशी बनाने की बात कर नीतीश ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। साथ ही उन्होंने पीएम पद के प्रत्याशी के मुद्दे पर आडवाणी के लिए जमीन तैयार करना भी शुरू कर दिया था। एनडीए में आडवाणी को आगे बढ़ाने की नीतीश की मंशा ही नहीं बल्कि उनकी छवि भी मोदी के लिए चुनौती बन रही थी। अगर नरेंद्र मोदी बीजेपी के विकास पुरुष बन रहे थे तो बिहार की कायापलट करने की वजह से नीतीश कुमार भी एनडीए के सुशासन पुरुष बन चुके थे।
एनडीए-बीजेपी को मोदी का सहारा
गुजरात में मोदी चुनावी सफलता की कहानी लिख रहे थे तो बिहार में नीतीश कुमार की चुनावी सफलता भी काबिल-ए-तारीफ थी। इसमें शक नहीं है कि एनडीए में नीतीश कुमार को मोदी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशें शुरू हो चुकी थीं। 3 सितंबर 2012 को आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा-मुझे लगता है कि भारत का अगला प्रधानमंत्री गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेसी राजनेता होगा।
दूसरी तरफ लोकप्रियता की लहर पर सवार मोदी भी बिहार बीजेपी में समर्थकों का आधार बना रहे थे।। 2012 में बिहार बीजेपी ने मोदी का जन्मदिन धूमधाम से मनाया। नवंबर 2012 में मोदी बीजेपी नेता कैलाशपति मिश्रा को श्रद्धांजलि देने पटना गए तो पीएम-पीएम की गूंज सुनाई दी। बिहार बीजेपी में मोदी का बढ़ता असर नीतीश को रास नहीं आ रहा था। उनका ये दर्द गठबंधन टूटने से पहले सामने आ गया। कहा-दुआ देते हैं जीने की, दवा करते हैं मरने की। समस्या की दरअसल जड़ यही है।
नीतीश कुमार के अलग होने के बाद अब बीजेपी की तरह एनडीए को भी नरेंद्र मोदी का सहारा है। उनकी छवि के सहारे ही एनडीए को 2014 में बड़े कमाल की उम्मीद है। ऐसे में नीतीश का जाना बीजेपी के लिए नुकसानदेह जरूर हो सकता है, लेकिन हर किसी पर ये बात सही नहीं साबित होती।

नया हथियार बना ‘जल सत्याग्रह’








आजादी के बाद से पांच हजार से अधिक परियोजनाओं के नाम पर ठोस कानून के अभाव और विस्थापन से आजीविका संकट, पुनर्वास का दंश झेल रहे लाखों लोगों और किसानों ने अलग-अलग रूपों में विरोध कर अपनी पीड़ा व्यक्त की और अब किसानों का नया हथियार ‘जल सत्याग्रह’ बन कर उभरा है।

सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि देश में अभी पांच हजार से अधिक परियोजनाएं चल रही है, लेकिन कभी भी यह जानकारी संकलित नहीं की गई कि कहां, कौन विस्थापित हो रहा है, लोग कहां जा रहे हैं, विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी को क्या हुआ? उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर बलि बेदी पर चढ़ाये जाने वाले लोगों में 65 प्रतिशत आदिवासी और दलित हैं। इनमें बड़ी संख्या में किसानों की है जिनकी आजीविका भूमि अधिग्रहण से छीन ली जाती है। इसी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए लोगों ने ‘जल सत्याग्रह’ का नया रास्ता चुना है।

सरकार भूमि अधिग्रहण कानून बनाने जा रही है लेकिन देखना यह होगा कि यह समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों और किसानों के हितों का कितना संरक्षण करती है। मध्यप्रदेश के खंडवा और हरदा जिले में लोगों ने 16 दिन तक नर्मदा नदी में खड़े होकर विरोध प्रदर्शन किया। इनकी मांगों में नर्मदा नदी पर बने ओंकारेश्वर बांध में पानी का स्तर 193 मीटर से घटाकराकर 189 मीटर करना और जमीन के बदले जमीन एवं मुआवजा शामिल थी। लोगों के जल सत्याग्रह के आगे झुकते हुए प्रदेश सरकार ने इनकी प्रमुख मांगें मान ली।

एशियन ह्यूमन राइट कमिशन से जुड़े शोधकर्ता सचिन कुमार जैन ने कहा कि इस तरह से परियोजनाओं के जन विरोध के दो कारण है। पहला ज्यादातर परियोजनाएं गांव, जंगल और नदियों के आसपास है, जिनपर लोगों की आजीविका ही नहीं बल्कि उनकी संस्कृति और सामाजिक पहचान निर्भर करती है। जैन ने कहा कि इन परियोजनाओं से प्रभावित लोग प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी चाहते हैं। वे एक एकड़ जमीन के बदले 10 लाख रूपया नहीं, बस उतनी ही जमीन चाहते हैं। वे सम्मानजनक पुनर्वास चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि लोगों में यह भावना है कि यदि जंगल खत्म हो गए, नदियां सूख गई और हवा जहरीली हो गई तब मानव स5यता खत्म हो जायेगी । भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के विषयों पर अभी 18 कानून है लेकिन एक ठोस राष्ट्रीय कानून का अभाव है।

उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले में शारदा नदी से होने वाले कटाव और भारी संख्या में लोगों के विस्थापित होने पर सरकार की बेरूखी के विरोध स्वरूप किसानों ने ‘जल सत्याग्रह’ शुरू कर दिया है। प्रतिदिन क्षेत्र से बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरूष नदी के पानी में खड़े हो रहे हैं। गोमती नदी के सिल्हौर सुबेहा घाट पर पुल के निर्माण की मांग को लेकर ‘जल सत्याग्रह’ शुरू किया है।

भूमि अधिकार के समर्थन में पद यात्रा निकालने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पी वी राजगोपाल ने कहा कि यदि देश के विकास के लिए परियोजनाओं को आगे बढ़ाना, बांध बनाना जरूरी है तब लोगों के जीवन के अधिकार को खत्म करके कैसा विकास होगा? लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधानों को अपने से दूर होता नहीं देखना चाहते हैं क्योंकि जमीन, पानी और प्राकृतिक संसाधान उनके जीवन के अधिकार हैं। ‘जल सत्याग्रह’ लोगों के शांतिपूर्ण विरोध का नया हथियार है।

गठबंधन टूटने पर आडवाणी नाराज



भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के 17 पुराना गठबंधन टूटने से भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी नाराज हो गए हैं। आज जदयू ने भाजपा से गठबंधन खत्म करने का ऐलान किया। आडवाणी ने जदयू से रिश्ता टूटने के लिए सीधे-सीधे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया है। आडवाणी ने आज (रविवार को) भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से फोन पर बात की। दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई। सूत्रों के मुताबिक बाचतीत के दौरान आडवाणी ने कहा कि गोवा में मोदी पर फैसला जल्दबाजी में लिया गया। इसी कारण जदयू से गठबंधन टूटा है। गौरतलब है कि गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था। यह फैसला आडवाणी की गैर मौजूदगी में लिया गया था। इससे नाराज होकर आडवाणी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी,प्रचार समिति और संसदीय बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि उन्होंने एनडीए के चेयरमैन पद, लोकसभा की सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था। दो दिन बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत के हस्तक्षेप के बाद आडवाणी ने इस्तीफा वापस ले लिया था।

एक्सपोज हो गये हैं शरद-नीतीश



राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने गुरुवार को कहा कि लालकृष्ण आडवाणी को लेकर जदयू अध्यक्ष शरद यादव व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक्सपोज हो गये हैं. मुंबई से दिल्ली लौट रहे राजद अध्यक्ष ने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी व नरेंद्र मोदी में कोई अंतर नहीं है. रही बात आरएसएस की, तो उसने जब आडवाणी की नहीं सुनी तो नीतीश कुमार की कैसे सुनेंगे. भाजपा और आरएसएस को धरम-करम, गरीब व देश से कुछ लेना-देना नहीं है.
मुख्यमंत्री पर हमला बोलते हुए कहा कि उनकी स्थिति ‘सात सौ चूहा खा के बिलाइ बनी भगतिन’ वाली हो गयी है. 2002 में नरेंद्र मोदी के कहने पर ही तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने गोधरा रेल कांड की जांच का आदेश नहीं दिया था. बाबरी मसजिद ढहाये जाने व गुजरात दंगे में कोई फर्क नहीं है. नीतीश कुमार उस समय भी एनडीए में शामिल थे. जनता को बताना होगा कि उस समय वह एनडीए से बाहर क्यों नहीं निकले.
श्री प्रसाद ने कहा कि भाजपा के साथ शरद यादव व नीतीश कुमार ने चुनाव बाद की डील की होगी, तो भी राजद उन्हें नहीं छोड़ेगा. जनता अब सब कुछ जान चुकी है. अल्पसंख्यक मतों को लेकर यह कवायद की जा रही है. अब पाप का घड़ा फूट रहा है. राजद इन सारी गतिविधियों पर नजर रखे हुए है.

जेडीयू ने बीजेपी से कहा 'राम-राम'



जेडीयू ने आखिरकार बीजेपी से नाता तोड़ लिया है। जेडीयू ने एनडीए के साथ अपने 17 साल पुराने रिश्ते को खत्म कर दिया है। अब से थोड़ी देर पहले पटना में जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीजेपी से अलग होने का ऐलान किया।
नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि वो फिर से विश्वास मत हासिल करेंगे। इसके लिए उन्होंने 19 जून को बिहार विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है। नीतीश कुमार के मुताबिक उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात कर बीजेपी कोटे के मंत्रियों को सरकार से हटाने की सिफारिश की है। वहीं बीजेपी की ओर से सबसे पहली प्रतिक्रिया नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज की ओर से आई। उन्होंने ट्वीट किया कि जेडीयू से गठबंधन टूटना दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है।

मीडिया से बात करते वक्त शरद यादव ने कहा कि उन्होंने सत्रह सालों तक गठबंधन का धर्म निभाया लेकिन अब बीजेपी जिस रास्ते पर चल पड़ी है वो उससे सहमत नहीं हैं और इसलिए उनकी पार्टी ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया है। वहीं नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें गठबंधन तोड़ने के लिए मजबूर किया गया।
प्रेस कॉन्फेंस में शरद यादव ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता दल (युनाइटेड) का 17 साल पुराना संबंध है। हमने गठबंधन बरकरार रखने की बहुत कोशिश की। लेकिन हम अपने उसूलों से कोई समझौता नहीं कर सकते। एनडीए अब अपने राष्ट्रीय एजेंडे से भटक गया है। ऐसे हालात में उनके साथ चलना मुश्किल हो रहा है। ऐसे हालात में अगर साथ रहते हैं तो न उनको कोई लाभ होगा और न हमें। ऐसे में गठबंधन का टूटना ही बेहतर है।
नीतीश कुमार ने कहा कि गठबंधन तोड़ने के लिए बीजेपी ने हमें मजबूर किया। अब हमारे सहयोगी दल में नया दौर आ गया है। हम सहयोगी दल में आए इस नए दौर के अभ्यस्त नहीं है। ऐसे में बीजेपी से अलग होना ही उचित है।
नीतीश ने बीजेपी के कोटे से बिहार में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के काम न करने पर कहा कि मंत्री रहते हुए काम नहीं करना अच्छी बात नहीं है। बिहार में गठबंधन ठीक चल रहा था लेकिन बाहरी हस्तक्षेप के चलते इसमें दिक्कत आ गई है। बाहरी हस्तक्षेप किस नेता का है इस सवाल पर नीतीश ने कहा कि समझने वाले समझ गए न समझे वो अनाड़ी है।
नीतीश कुमार ने 19 जून को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है। वे उसी दिन सदन में विश्वास मत हासिल करेंगे। नीतीश ने कहा कि चाहे जो परिणाम हो, हमें चिंता नहीं लेकिन हम अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं कर सकते। शरद यादव ने कहा कि वे गठबंधन टूटने के साथ ही एनडीए के संयोजक पद से इस्तीफा दे रहे हैं।
नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में गठबंधन ठीक चल रहा था लेकिन हालात ऐसे कर दिए गए कि हम अपनी उपलब्धियों का प्रचार भी करते हैं तो ये कहा जाता है कि ये उनके फलां नेता के खिलाफ है। ऐसे हालात में काम करना मुश्किल है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन अब ये मजबूरी में फैसला लेना पड़ा। गठबंधन टूटने के जिम्मेदार हम नहीं हैं।