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Saturday, 5 September 2015

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

भगवान श्रीकृष्ण को प्रेम का अवतार माना जाता है। उन्होंने इस दुनिया को प्रेम का सच्चा पाठ पढ़ाया।

जब-जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है।

इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया।

चूँकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी अथवा जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष रात्रि बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झाँकियाँ सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है।

प्रेम के प्रतीक भगवान् के जन्मदिन को सच्ची लगन एवं प्रेम भावना के साथ अपने पूरे परिवार के साथ मनाएं।
जय श्रीकृष्ण ........ जय श्रीकृष्ण.........जय श्रीकृष्ण........जय श्रीकृष्ण  

अजीत कुमार पाण्डेय,  राष्टीय अध्यक्ष- पूर्वांचल विकास मोर्चा

Friday, 14 August 2015

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें

आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं।

कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है।

चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत।

ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है।

अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के '0' को रोते रहेंगे।

कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर।

मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!

जय हिन्द! जय भारत!
अजीत कुमार पाण्डेय
राष्टीय अध्यक्ष,  पूर्वांचल विकास मोर्चा
सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
 एवं शुभकामनायें
आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के '0' को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
जय हिन्द! जय भारत!
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सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
 एवं शुभकामनायें
आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के '0' को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
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 एवं शुभकामनायें
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 एवं शुभकामनायें
आजकल हम लोगों के लिए 15 अगस्त एक छुट्टी मात्र ही तो रह गया है। इस दिन हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और बाकी पूरे साले उस आज़ादी का दुरूपयोग करते हैं। कहीं सुना था कि 68 साल में क्या बदला। कुछ ख़ास नहीं पहले अँगरेज़ यहां से पैसा लूट कर विदेश ले जाते थे और आज हम खुद अपना धन लूट कर विदेशों में जमा करते हैं। हमारे देश का कड़वा सत्य यही है कि यहां देशप्रेम सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही दिखता है। चाहे रिश्वत देना हो या लेना, सड़क पर चलना हो या थूकना, दो सेकंड में किसी की भी माता जी और बहन जी तक पहुँच जाना, दंगे कराना और उसके मज़े लेना, बलात्कारियों में धर्म ढून्ढ लेना ये है हमारा और आपका आज़ाद भारत। ऑस्ट्रेलिया में 90 टन की ट्रेन को 50-60 लोग मिलकर झुका देते हैं ताकि एक आदमी की जिंदगी बच जाए और यहां हज़रत निजामुद्दीन पर एक आदमी 40 टन की ट्रेन के नीचे डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद मर जाता है। अरे हमारा बस चले तो सड़क चलते आदमी के ऊपर ही गाडी चढ़ा दें। क्या ये वही सपनों का भारत है जो आज से 67 साल पहले देखा गया था? कब तक हम आर्यभट्ट के '0' को रोते रहेंगे। कब तक अपनी संस्कृति की दुहाई देते रहेंगे। आज का भारत क्या सच में आज़ाद भारत है? इतने प्रयासों, मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली इस आज़ादी की क़द्र होनी चाहिए मुझे। मुझे सच में गर्व होना चाहिए हिन्दुस्तानी होने पर और हिन्दुस्तानियोंके बीच रहने पर। मेरी और आपकी, हम सबकी कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ हैं इस देश के प्रति। एक बार जरा सोचियेगा जरूर क्योंकि सिर्फ नेता नहीं चलाते देश हम सब भी उसके सहभागी हैं!
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Friday, 7 August 2015

क्या सुषमा स्वराज के बयान से निकलेगी कोई राह?

सुषमा स्वराज ने ‘ललितगेट’ कांड में अपनी सफाई पेश करते हुए लोकसभा में भावपूर्ण वक्तव्य दिया। वे तर्क दोहराए, जो इस मामले में वे अपने बचाव में पेश करती रही हैं। सारांश यह कि उनकी मंशा ललित मोदी की नहीं, बल्कि उनकी कैंसर पीड़ित पत्नी की मदद करने की थी। फिर भी उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से मोदी को यात्रा दस्तावेज देने की पैरवी नहीं की, बल्कि महज यह कहा कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उससे भारत से ब्रिटेन के रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 


 दुख जताया कि उनके विपक्षी ‘दोस्त’ उनका पक्ष सुनने तक को तैयार नहीं हैं और उनसे पूछा कि उन्होंने क्या गलत किया है। इसके बाद रामचरितमानस का हवाला देते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश आदि मनुष्य नहीं बल्कि विधि यानी ईश्वर के हाथ में हैं। मगर उनके लिए अफसोस यह रहा कि इन बातों को सुनने के लिए अधिकतर विपक्षी सदस्य सदन में नहीं थे। 

कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दल पहले ही अपना फैसला सुना चुके हैं कि विदेश मंत्री का आचरण नैतिक रूप से गलत था, क्योंकि उनके पति एवं बेटी के पेशेवर हित ललित मोदी से जुड़े थे। कांग्रेस तो यह दावा करने तक गई है कि स्वराज ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत ‘अपराध’ किया। 

अतः विपक्ष स्वराज की कोई बात सुनने से पहले उनका इस्तीफा चाहता है। जबकि भाजपा की तरफ से कहा जा चुका है कि वह ‘यूपीए नहीं है’, अतः कोई इस्तीफा नहीं होगा। यानी दोनों पक्ष अपने रुख के चरम बिंदु पर हैं। इस पर कायम रहते मेल-मिलाप की कोई सूरत नहीं निकल सकती। इस रुख में बदलाव की गुंजाइश इसलिए नहीं बन रही है, क्योंकि मसले को गुण-दोष के आधार पर देखने की बजाय सियासी स्वार्थ से प्रेरित होने की प्रवृत्ति राजनीतिक समुदाय पर अधिक हावी है। 

दुर्भाग्यपूर्ण है कि दोनों पक्षों ने प्रत्यक्ष आपसी संवाद तोड़ रखा है। यह लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है। इसके बावजूद यह रेखांकित करने का पहलू है कि स्वराज का स्वर टकराव भरा नहीं था। इसे सकारात्मक नज़रिया माना जाएगा। दोनों पक्ष ऐसा दृष्टिकोण अपनाएं तो अटूट लगते वर्तमान गतिरोध के बीच भी राह निकल सकती है। 

क्या यह संभव नहीं है कि प्रधानमंत्री विपक्षी नेताओं की बैठक बुलाएं, जिसमें दोस्ताना माहौल में खुल कर बात हो? फिलहाल देश समाधान की आस में है, ताकि राष्ट्र हित से जुड़े विधायी कार्य पूरे हो सकें।

Tuesday, 21 July 2015

मोदी का मौन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन आज जब वे मॉनसून सत्र की कार्यवाही में शरीक होने के लिए संसद भवन पहुंचे तो पत्रकारों के सवालों को अनसुना कर अपनी चुप्पी जारी रखी. पत्रकारों ने मोदी से एक के बाद एक कई सवाल किए, लेकिन मोदी हल्की मुस्कुराहट के साथ पत्रकारों के सवालों को अनसुना करते रहे.

एक पत्रकार ने मोदी से पूछा कि करप्शन के सवाल पर आपका क्या कहना है? मोदी ने इस सवाल को जैसे ही अनसुना किया, दूसरा सवाल दाग़ दिया गया. दूसरा सवाल था कि क्या आपको सत्र के सुचारू रुप से चलने की उम्मीद है? मोदी इस सवाल पर भी खामोश रहे. वे सवाल सुनते रहे, और अपनी गर्दन इधर से उधर हिलाते रहे. इसी बीच तीसरा सवाल किया गया कि कांग्रेस ने स्थगन प्रस्ताव के लिए नोटिस दिया है. क्या सरकार बहस के लिए तैयार है? मोदी ने इस सवाल पर अपनी खामोशी जारी रखी. पत्रकार सवाल किए जा रहे थे और उनके पीछे खड़े मंत्रीगण मुस्कुरा रहे थे. लेकिन पत्रकार भी अपने सवाल जारी रखे हुए थे. अगला सवाल किया गया कि जमीन बिल पर आपका क्या कहना है?

इन सवालों को अनसुना करके मोदी मुड़े और चल दिए. अब सवाल किया जा रहा है कि आखिर मोदी अपनी चुप्पी कब तोड़ेंगे?

Tuesday, 23 June 2015

ललितगेट कांड में मोदी सरकार ने दांव पर लगाई साख



विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक जीवन पर ललितगेट कांड का दूरगामी असर पड़ने जा रहा है। सुप्रशासन और पारदर्शिता के जिस मुद्दे पर भाजपा बहुमत से चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी, इस कांड ने उसी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। इसका असर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर भी पड़ा है। सवाल पूछे जाने लगे हैं कि आखिर क्या बात है कि जनता के चहेते प्रधानमंत्री, जिन्होंने दिल्ली के सत्ताकुलीनों के खिलाफ लड़ाई छेड़कर देशवासियों का भरपूर समर्थन पाया था, अब खुद उसी सत्ता-संरचना का बचाव करने लगे हैं? लोग जानना चाहते हैं, लेकिन अपने से पूर्ववर्ती 'मौन मोहन" की तरह नरेंद्र मोदी ने भी अभी तक इस बारे में अपने 'मन की बात" देशवासियों से साझा नहीं की है।

भाजपा ने अभी तक तो अपनी इन दो कद्दावर महिला नेत्रियों का जमकर बचाव किया है। शायद उसका आकलन यह है कि जल्द ही यह स्कैंडल भुला दिया जाएगा और दूसरी खबरें उस पर हावी हो जाएंगी। अवाम की याददाश्त कमजोर होती है और मीडिया की याददाश्त तो अवाम से भी कमजोर होती है। ऐसे कई तरीके हैं, जिनकी मदद से देश में फीलगुड का माहौल पैदा कर इस कांड को भुलाया जा सकता है, जैसे कि बीमा और पेंशन संबंधी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा करके किसानों की आमदनी बढ़ाना, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में सार्वजनिक निवेश के माध्यम से रोजगार के अवसर निर्मित करना या छोटे उद्यमियों को आसान कर्ज की सुविधा मुहैया कराना वगैरह-वगैरह। हो सकता है यह एक नेक सोच हो, लेकिन इसमें एक गड़बड़ यह है कि घोटालों को भले ही कुछ देर के लिए भुला दिया जाए, लेकिन वे कभी खत्म नहीं होते हैं। यूपीए सरकार से अच्छी तरह इस बात को भला कौन जान सकता है कि घोटाले चुटकी बजाते ही कभी भी फिर उठ खड़े होते हैं।

यही कारण है कि बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के घोटाले को भले ही फिलवक्त भुला दिया गया हो, लेकिन अब ललितगेट कांड के बाद पार्टी के भीतर सुषमा स्वराज के विरोधियों द्वारा उन्हें फिर से उठाया जाएगा, क्योंकि सुषमा को रेड्डी बंधुओं की 'गॉडमदर" कहा जाता था। जब सुषमा दिल्ली की मुख्यमंत्री हुआ करती थीं, तब बताया जाता है कि उन्होंने दाउद इब्राहीम के सहयोगी माने जाने वाले रोमेश शर्मा की मदद की थी। लेकिन शर्मा के मामले की जांच कर रहे आयकर अधिकारी का रातोंरात तबादला करवा दिया गया था। सूचनाओं के इस डिजिटल युग में कोई घटना पूरी तरह से मरती नहीं है, और कोई नहीं जानता अतीत की किस घटना का भूत कब फिर से जीवित होकर हमें सताने लगेगा।

कम ही लोगों को इस बात में भरोसा है कि ललित मोदी की मदद के लिए ब्रिटिश सरकार को फोन लगाने से पहले स्वराज ने प्रधानमंत्री से राय-मशविरा किया था। ललित मोदी, जिनके खिलाफ 16 मामले दर्ज हैं, से सुषमा की दोस्ती 15 साल पुरानी है। बताया जाता है कि जब अटल सरकार के समय सुषमा केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री थीं, तब से ही ललित मोदी से उनकी मित्रता रही है और मोदी उनकी मदद से एक प्रसारण एजेंसी चला रहे थे। इसके बावजूद अगर सुषमा ने ब्रिटिश सरकार से बात करके अपने पुराने दोस्त की मदद की तो इसमें अप्रत्याशित कुछ नहीं है। वास्तव में, नेताओं, नौकरशाहों, कारोबारियों, मीडिया के प्रभावशाली लोगों के बीच आपसी मदद के लेनदेन की ऐसी घटनाएं नई दिल्ली में आमतौर पर होती ही रहती हैं। और 'हितों के टकराव" की घटनाएं तो इतनी आम हैं कि कोई उन पर टिप्पणी तक नहीं करता। वैसे भी, सत्ताधीशों के लिए केवल अपना लाभ सर्वोपरि होता है, जनहित से उन्हें कोई लेनादेना नहीं होता।

Thursday, 18 June 2015

बिहार की राजनीति का रावण कौन?

बिहार में राम कौन और रावण कौन ? इसको जानने के लिए पहले विभीषण के किरदार को समझना जरूरी है. विभीषण लंका के राजा रावण का सबसे छोटा भाई था. सीता माता को लेकर जब वानरों की सेना के साथ भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई की तो विभीषण ने रावण का साथ न देकर राम का साथ दिया था. अंत में सबके सब मारे गए और सिर्फ विभीषण ही जिंदा बचे थे.

अब बिहार की राजनीति में नीतीश मांझी को विभीषण बताकर क्या कहना चाहते हैं ये तो वहीं जाने लेकिन कथा कहानियों में सत्य यही है कि रावण का साथ छोड़कर विभीषण राम के खेमे में आए थे. और बिहार का सत्य ये है कि कल तक नीतीश के भरोसेमंद रहे मांझी अब नीतीश का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ खड़े हैं. नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद इस्तीफा देकर पिछले साल मांझी को सीएम बनाया था. उस वक्त पार्टी में किसी ने कल्पना नहीं की थी कि नीतीश मांझी को अपना उत्तराधिकारी बनाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ. लेकिन 10 महीने बाद ही इस साल फरवरी में मांझी से मोहभंग हो गया. अब उन्हीं मांझी को विभीषण बताकर निशाना साध रहे हैं.

नीतीश ने मांझी को विभीषण कहा तो बीजेपी के तमाम नेता राशन पानी के साथ नीतीश पर चढ़ गए. ये बताने के लिए कि मांझी विभीषण हैं तो नीतीश बिहार की राजनीति के रावण. सुशील कुमार मोदी से लेकर केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव तक सबने नीतीश को बारी बारी से रावण बताया. और बीजेपी खेमे को राम. मांझी खुद भी चुप नहीं हैं. मुजफ्फरपुर गए तो पत्रकारों से कह दिया कि वो विभीषण हैं और नीतीश की लंका को चुनाव में जलाकर दिखाएंगे. ऐसा नहीं कि बिहार के इस ‘राजनीतिक रामायण’ में विरोधियों ने लालू को अलग रखा है. जीतन राम मांझी की पार्टी लालू को कुंभकर्ण (रावण का मंझला भाई) बता रही है.

रावण बताने की ये लड़ाई पुरानी है. पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद जब विधानसभा के उपचुनाव में लालू-नीतीश की जोड़ी को जीत मिली थी तब नीतीश ने बीजेपी की तुलना रावण से की थी. नीतीश ने तब केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि जब रावण का घमंड नहीं रहा तो फिर बीजेपी क्या चीज है ?  तब बीजेपी हारी हुई थी और उनके पास हमले के जवाब का मौका नहीं था. अब बीजेपी को मौका मिला है तो नीतीश के बयान के जरिए ही पार्टी उन्हें रावण बताने में जुटी है.

असल में इस राजनीतिक रामायण की लड़ाई के पीछे भी वोट बैंक का ही गणित है. मांझी बिहार की राजनीति के केंद्र में इसलिए हैं क्योंकि नीतीश कुमार मांझी को राजनीति से आउट बताने में जुटे हैं और बीजेपी मांझी के सहारे महादलित वोट बैंक पर पकड़ और मजबूत करना चाहती है. बिहार में करीब 16 फीसदी महादलित वोट हैं. जब मांझी मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने महादलित समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी. बीजेपी को उम्मीद है कि मांझी के सहारे वो नीतीश के भरोसेमंद महादलित वोट बैंक में सेंध लगाकर उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं. बीजेपी इसीलिए मांझी को भरपूर भाव दे रही है. लेकिन नीतीश मांझी को बिहार में आज कोई फैक्टर नहीं बताकर उनका कद कम करना चाहते हैं.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई में बीजेपी के लिए मांझी विभीषण साबित हो पाएंगे ? मांझी बिहार में आज जाति विशेष के प्रतीक भर बनकर रह गए हैं. विवादित बयानों की वजह से भी मांझी की छवि विवादित बन चुकी है. आज की राजनीतिक परिस्थिति में इस बात को लेकर शक है कि वो किसी का भविष्य बना सकते हैं. लेकिन बिगाड़ने की स्थिति में कमोबेश जरूर हैं. नीतीश से बागी होकर जो विधायक मांझी के साथ खड़े थे उनमें से ज्यादा बीजेपी के साथ जाने को तैयार खड़े हैं. मुट्टी भर लोग मांझी के साथ बचे हैं. ये वो लोग हैं जो अपने वोट बैंक और स्थानीय कारणों से बीजेपी के टिकट पर नहीं लड़ना चाहते. लेकिन जिनकी राजनितिक मजबूरी नहीं हैं वो सीधे सीधे बीजेपी के टिकट पर लड़ने को तैयार हैं. जो राजनीति परिस्थिति बन रही है उसमें मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को बीजेपी अधिकतम 10-12 सीटें लड़ने को दे सकती है.
 बीजेपी की कोशिश है कि मांझी खुद चुनाव न लड़ें और एनडीए उम्मीदवारों का प्रचार करें. ऐसा उसी परिस्थिति में संभव है जब मांझी के परिवार से किसी को चुनाव का टिकट मिलेगा. अब देखना पड़ेगा कि नीतीश के लिए विभीषण बन चुके मांझी बीजेपी खेमे के लिए विभीषण साबित हो पाते हैं या नहीं.

Saturday, 28 March 2015

'भारत रत्न' हुए अटल बिहारी वाजपेयी



 भारत रत्न का सम्मान राष्ट्रपति भवन में दिए जाने की परंपरा है, लेकिन बीमारी के चलते राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोटोकॉल से हटकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को  कृष्ण मेनन मार्ग स्थित उनके घर पर भारत रत्न से सम्मानित किया। करिश्माई नेता, ओजस्वी वक्ता और प्रखर कवि के रुप में प्रख्यात वाजपेयी को साहसिक पहल के लिए भी जाना जाता है, जिसमें प्रधानमंत्री के रुप में उनकी 1999 की ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा शामिल है, जब पाकिस्तान जाकर उन्होंने वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर किए। 1998 से 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी बीमारी के चलते काफी समय से सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। इस ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी व अन्य नेता भी मौजूद थे। इस मौके पर वाजपेयी का एक फोटो भी जारी किया गया। कई साल बाद वाजपेयी का कोई फोटो नजर आया है।
ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को जन्मे वाजपेयी पहले जनसंघ फिर बीजेपी के संस्थापक अध्यक्ष रहे। 955 में उन्होंने जनसंघ के टिकिट पर पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। इनमें से बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से चुनाव जीतकर वह पहली बार लोकसभा पहुंचे। 1977 में केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। वाजपेयी उस सरकार में विदेश मंत्री बनाए गए। इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया। ऐसा करने वाले वह देश के पहले नेता थे।वाजपेयी अपना कार्यकाल पूरा करने वाले एकमात्र गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं। 1998 में वे देश के दसवें प्रधानमंत्री बने।वाजपेयी ने 2005 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। वाजपेयी की सेहत काफी समय खराब चल रही है।
वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ कवि भी हैं। 'मेरी इक्यावन कविताएं' अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। जगजीत सिंह के साथ उन्होंने दो एलबम 'नई दिशा' (1999) और 'संवेदना' (2002) भी रिलीस कीं। वाजपेयी लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर-अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे।
तीन बार प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने, जिनका कांग्रेस से कभी नाता नहीं रहा। साथ ही वह कांग्रेस के अलावा के किसी अन्य दल के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से गहरे से जुडे होने के बावजूद वाजपेयी की एक धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी छवि है। उनकी लोकप्रियता भी दलगत सीमाओं से परे है। पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने और फिर पूरे पांच साल तक। वाजपेयी इकलौते नेता थे, जो जब बोलना शुरू करते थे तो सदन का हर सदस्य बिना शोर शराबे की उनकी बात सुनता था। उनकी भाषण कला के मुरीद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी रहे। वाजपेयी मंझे हुए राजनेता रहे तो कोमल हृदय कवि भी। तमाम मुद्दों पर उनकी कलम से निकली कविताएं सीधे लोगों के दिल तक पहुंची।
वाजपेयी और प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं स्वतंत्रता सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न देने की घोषणा 24 दिसम्बर को की गई थी। इत्तेफाक की बात यह है कि वाजपेयी और मालवीय दोनों का जन्मदिन 25 दिसंबर है। वाजपेयी का जन्म इस तारीख को 1924 में और मालवीय का जन्म 1861 को हुआ था। महामना को मरणोपरांत इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। उनके परिजनों को 30 मार्च को राष्ट्रपति भवन में यह पुरस्कार दिया जाएगा। वाजपेयी और महामना इस पुरस्कार से नवाजे जाने वाली 44वीं व 45वीं हस्ती हैं।