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Monday, 16 February 2015

Poorvanchal vs Bhartiya Janta Party


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Wednesday, 11 February 2015

केजरीवाल के लिए तैयार है कांटों की सेज!

दिल्ली विधानसभा चुनावों में महज दो साल पुरानी आम आदमी पार्टी ने केंद्र और 10 से अधिक राज्यों में शासन करने वाली भारतीय जनता पार्टी को पटखनी दे दी है। दिल्ली ने भी दिसंबर 2013 में ‘आप’ को पूर्ण बहुमत ना दे पाने की अपनी भूल सुधार ली है। अब बारी अरविंद केजरीवाल की है। उन्हें 49 दिनों में की गई अपनी गलतियों को भी सुधारने के साथ-साथ दिल्लीवासियों से किए गए अपने वायदे पूरे करने को कांटों की इस सेज पर चलना होगा।
kejriwal14कठिन होगा DDA से तालमेल बिठाना
दरअसल, आप के मुख्य वायदों में शामिल जनलोकपाल बिल, पूर्ण राज्य का दर्जा, आवसीय योजना, कानून व्यवस्था, पूरी दिल्ली को सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से युक्त करने सहित अन्य कामों के लिए बजट या मंजूरी उसके सबसे बड़े मौजूदा राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा की मोदी सरकार से ही मिलेगी।
सिर्फ बड़े मुद्दों का सवाल ही नहीं है। बड़ा चुनावी मुद्दा रहे अनाधिकृत कॉलोनियों को अधिकृत करने, उनके विकास कार्य, बजट के अभाव में पूर्वी दिल्ली, उत्तरी व दक्षिणी दिल्ली नगर निगमों में सालों व महीनों से अटकी वृद्धा व विधवा पेंशन व अन्य गली-मुहल्ले के छोटे कामकाज के लिए भी केजरीवाल के सामने संकट खड़ा हो सकता है। वहीं, बिजली-पानी का भी दिल्ली में आपूर्ति करना मुश्किल भरा कदम साबित हो सकता है।
गर्मी में पानी की समस्या से जूझना होगा
हरियाणा की भाजपा सरकार अगर मुनक नहर में पानी नहीं छोड़ती है तो गर्मी में पानी की समस्या से भी जूझना पड़ेगा। दिल्ली के विकास को लेकर बना दिल्ली विकास प्राधिकरण से भी तालमेल बिठाना कठिन होगा। क्योंकि यह प्राधिकरण सीधे तौर पर केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन है।
दिल्ली में एतिहासिक जीत के बाद भले ही केजरीवाल भाजपा के कब्जे वालीं नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर वहां कब्जा कराने की कोशिश करें, लेकिन यह भी 2017 तक संभव नहीं होगा, क्योंकि 2017 में नगर निगम में चुनाव होने के बाद ही सत्ता परिवर्तन संभव है।
अपने वायदों का जवाब जनता व मीडिया को देना होगा
वर्ष 2013 में 28 विधानसभा सीटें आने के बाद कांग्रेस के समर्थन से जब केजरीवाल ने सरकार बनाई थी तो जनलोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने 49 दिनों में सरकार छोड़ दी। उन्हें भगौड़ा बताने वाले विपक्ष ने यह मुद्दा इस चुनाव में भी कायम रखा।
जानकारों की माने तो जनलोकपाल सहित अन्य मुद्दों पर पूर्ण बहुमत मिलने पर केजरीवाल सरकार इस बार योजनाबद्ध तरीके से इंतजार तो कर सकती है लेकिन उसे जनता व मीडिया के बीच अपने वायदों का जवाब समय-समय पर देना होगा।
कानून- व्यवस्था होगी सबसे बड़ा इश्यू 
तमाम बजट व योजनाएं एलजी के माध्यम से केंद्र सरकार से मंजूरी के बिना न मिलने के अलावा केंद्र के ही अधीन कानून व्यवस्था भी एक बड़ा इश्यू है। वैसे भी प्रचार के दौरान भाजपा नेता मंच से यह बोलते रहे कि केंद्र के बाद राज्य की सरकार जनता बनाती है तो ही सभी काम हो आसानी से हो सकेंगे।

दिल्ली सरकार की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसे की बैंक में लॉकर लिया जाता है। लॉकर के इस्तेमाल में बैंकर व ग्राहक के पास मौजूद दोनों चाबी लगने पर ही लॉकर खुलता है। दिल्ली की सरकार के साथ केंद्र सरकार की चाबी लगे बिना अधिकांश कार्य संभव नहीं है।

Saturday, 24 January 2015

आत्ममंथन और आत्मगौरव का बेहतर दिन


हम विविध, विभिन्न बोली, भाषा, रंगरूप, रहन-सहन, खाना-पान, जलवायु में होने के बावजूद एकी संस्कृति की माला पिरोये हुए हैं। हमारे लोकतंत्र के प्रहरी अपने इस अवसर सपने को परिपक्वता के साथ मजबूत दीवार एवरेस्ट की चोटी से ऊंचा बना लिया है। कई उतार-चढ़ाव आए, आपातकाल भी देखा लेकिन भारत की सार्वभौमिकता बरकरार है। जनतंत्र-गणतंत्र की प्रौढ़ता को हम पार कर रहे हैं लेकिन आम जनता को उसके अधिकार, कर्तव्य, ईमानदारी समझाने में पिछड़े, कमजोर, गैर जिम्मेदार साबित हो रहे हैं। चूंकि स्वयं समझाने वाला प्रत्येक राजनीतिक पार्टियां, नेता स्वयं ही कर्तव्य, ईमानदारी से अछूते, गैर जिम्मेदार हैं।
इसलिए असमानता की खाई गहराती जा रही है और असमानता, गैरबराबरी बढ़ गई है। जबकि बराबरी के आधार पर ही समाज की उत्पत्ति हुई थी। 1947 में गांधी जी, ने भी बराबरी का बात कही थी लेकिन लोलुप अमानवीयता की हदें पार कर जनतंत्र-गणतंत्र को रौंद रहे हैं।
हर वर्ष 26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्‍येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्‍नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्‍वपूर्ण स्‍मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है। यही वह दिन है जब जनवरी 1930 में लाहौर ने पंडित जवाहर लाल नेहरु ने तिरंगे को फहराया था और स्‍वतंत्र भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की स्‍थापना की घोषणा की गई थी। 26 जनवरी 1950 वह दिन था जब भारतीय गणतंत्र और इसका संविधान प्रभावी हुए। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्‍दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।
गणतंत्र दिवस के जश्न का सफर कई दौर से गुजरा है। कभी राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद बग्घी में बैठकर परेड में हिस्सा लेने पहुंचते थे। एक दौर ऐसा भी आया जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद परेड की अगुवाई की। पहले 5 साल तक तो यही तय नहीं था कि गणतंत्र दिवस समारोह कहां मनाया जाए। 1955 से तय हुआ कि परेड राजपथ से निकलेगी और लालकिले तक जाएगी। आजादी के बाद तत्कालीन गवर्नर सी. राजगोपालाचारी ने सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर भारत को गणराज्य घोषित किया। छह मिनट के भीतर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। गणतंत्र दिवस समारोह पहले से तय था। दोपहर 2 बजकर 30 मिनट पर राजेंद्र बाबू बग्घी में सवार होकर गवर्मेंट हाउस (राष्ट्रपति भवन) से निकले। कनॉट प्लेस जैसे नई दिल्ली के इलाकों का चक्कर लगाते हुए 3 बजकर 45 मिनट पर पुराने किले के पास स्थित नेशनल स्टेडियम पहुंचे। यह मैदान तब इरविन स्टेडियम कहलाता था। राजेंद्र बाबू जिस शाही बग्घी में सवार हुए थे वह 35 साल पुरानी थी। छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़े उनकी बग्घी को खींच रहे थे। पहले समारोह के लिए प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो को न्यौता दिया था। परेड स्थल पर राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू को शाम के वक्त 31 तोपों की सलामी दी गई थी।
इस अवसर के महत्‍व को दर्शाने के लिए हर वर्ष गणतंत्र दिवस पूरे देश में बड़े उत्‍साह के साथ मनाया जाता है, और राजधानी, नई दिल्‍ली में राष्‍ट्र‍पति भवन के समीप रायसीना पहाड़ी से राजपथ पर गुजरते हुए इंडिया गेट तक और बाद में ऐतिहासिक लाल किले तक शानदार परेड का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन भारत के प्रधानमंत्री द्वारा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्‍योति पर पुष्‍प अर्पित करने के साथ आरंभ होता है, जो उन सभी सैनिकों की स्‍मृति में है जिन्‍होंने देश के लिए अपने जीवन कुर्बान कर दिए। इसे शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्‍ट्रपति महोदय द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया जाता है और राष्‍ट्रीय गान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है।
महामहिम राष्‍ट्रपति के साथ एक उल्‍लेखनीय विदेशी राष्‍ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्‍हें आयोजन के मुख्‍य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। राष्‍ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्‍ट्रपति, जो भारतीय सशस्‍त्र बल, के मुख्‍य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि। इसके शीघ्र बाद राष्‍ट्रपति द्वारा सशस्‍त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्‍कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्‍होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्‍मानित किया जाता है जिन्‍होंने विभिन्‍न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए। इसके बाद सशस्‍त्र सेना के हेलिकॉप्‍टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्‍ट करते हैं। सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्‍कृतिक परेड होती है। विभिन्‍न राज्‍यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्‍येक राज्‍य अपने अनोखे त्‍यौहारों, ऐतिहासिक स्‍थलों और कला का प्रदर्शन करते है। यह प्रदर्शनी भारत की संस्‍कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्‍यौहार का रंग देती है।
विभिन्‍न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्‍ट्र की प्र‍गति में अपने योगदान प्रस्‍तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्‍सा तब आता है जब बच्‍चे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय वीरता पुरस्‍कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्‍कूली बच्‍चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्‍य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्‍तुत करते हैं। परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्‍त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्‍ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्‍ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्‍ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं। राज्‍यों में होने वाले आयोजन अपेक्षाकृत छोटे स्‍तर पर होते हैं और ये सभी राज्‍यों की राजधानियों में आयोजित किए जाते हैं। यहां राज्य के राज्‍यपाल तिरंगा झंडा फहराते हैं। समान प्रकार के आयोजन जिला मुख्‍यालय, उप संभाग, तालुकों और पंचायतों में भी किए जाते हैं।
गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एनसीसी केडेट्स द्वारा विभिन्‍न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं। सात क्षेत्रीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्रों के साथ मिलकर संस्‍कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच ‘’लोक तरंग - राष्‍ट्रीय लोक नृत्‍य समारोह’’ आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्‍न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्‍तविक लोक नृत्‍य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।
बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं। ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्‍मा गांधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन ‘’सारे जहां से अच्‍छा बजाते हैं। ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।
भारत के संविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्त्व था। 26 जनवरी को विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था, 31 दिसंबर सन् 1929 के मध्‍य रात्रि में राष्‍ट्र को स्वतंत्र बनाने की पहल करते हुए लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हु‌आ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की ग‌ई कि यदि अंग्रेज़ सरकार 26 जनवरी, 1930 तक भारत को उपनिवेश का पद (डोमीनियन स्टेटस) नहीं प्रदान करेगी तो भारत अपने को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी, 1930 तक जब अंग्रेज़ सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ ही इस दिन सर्वसम्मति से एक और महत्त्वपूर्ण फैसला लिया गया कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन सभी स्वतंत्रता सेनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे। इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

Thursday, 22 January 2015

जिनपर की राजनीति, उन्हीं के हाथ रह गए खाली

भाजपा की सूची जारी होने के बाद दिल्ली में रहने वाले प्रवासी पूर्वांचली खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
वे इस बात को लेकर हैं नाराज है कि संख्या के आधार पर उन्हें पार्टी ने तरजीह नहीं दी। इतना ही नहीं वैसे लोगों को टिकट दे दिया है जो सदस्यता अभियान में भी सक्रिय नहीं रहे। इस बार पूर्वाचलियों को 70 सीटों में से महज 2 प्रत्याशियों को टिकट मिला है। 

पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में पूर्वांचलियों की ताकत को समझा था और जितने पूर्वांचलियों को अरविंद की पार्टी ने टिकट दिया था, उनमें से ज्‍यादातर जीतने में सफल रहे थे। भाजपा ने भी पूर्वाचलियों की ताकत को समझा था और पहली बार 5 पूर्वाचलियों को विधानसभा का टिकट दिया था, जिसमें से ज्‍यादातर जीतने में सफल रहे थे। इसी जीत के बाद दिल्‍ली के पूर्वांचली मतदाता भाजपा के लिए महत्‍वपूर्ण हो गए और उसने भोजपुरी के सबसे बडे स्‍टार मनोज तिवारी को उत्‍तर-पूर्वी दिल्‍ली से सांसद बनाया।
मनोज तिवारी तो जीतने में सफल रहे ही, उनका असर अन्‍य सीटों पर भी पड़ा और पूर्वाचली मतदाता गोलबंद होकर भाजपा के पीछे एकजुट हो गया, जिसका परिणाम सामने है। दिल्‍ली में भाजपा ने सबसे पहले पूर्वांचल से लालबिहारी तिवारी को लोकसभा का टिकट दिया था और आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि उस वर्ष भाजपा सातों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही थी। लालबिहारी तिवारी के कारण दिल्‍ली के सभी सीटों पर पूर्वांचली मतदाता भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो गए थे। लेकिन जब से भाजपा ने पंजाबी-बनिया लॉबी के कारण एक मात्र पूर्वांचली लालबिहारी तिवारी को किनारे लगाया, भाजपा दिल्‍ली में सत्‍ता से दूर होती चली गई। लोकसभा-2014 में भाजपा ने इस गलती को सुधारा और मनोज तिवारी को टिकट दियाा असर देखिए कि फिर एक बार भाजपा दिल्‍ली की सातों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही।

छठ पर्व पर दिल्‍ली से बिहार व पूर्वी उप्र की ओर जाने वाली रेलगाडि़यों की संख्‍या के हिसाब से दिल्‍ली में करीब 40 लाख पूर्वांचली मतदाता हैं। कांग्रेस ने केवल एक महाबल मिश्रा के परिवार तक पूर्वांचल को सीमित कर दिया, जिसका शुरु में तो लाभ हुआ, लेकिन अंत में कांग्रेस को बेहद नुकसान हुआ। महाबल मिश्रा को पार्षद, विधायक और 2009 में लोकसभा का उम्‍मीदवार बनाने के कारण लगातार 15 साल कांग्रेस की सरकार रही और पहली बार कांग्रेस 2009 में सातों लोकसभा सीटें जीतने में भी सफल रही थी। लेकिन महाबल मिश्रा के परिवारवाद के कारण पूर्वांचल की जनता कांग्रेस से दूर होती चली गई, जिसका खामियाजा कांग्रेस को बुरी तरह से उठाना पड़ा। यहां तक कि पिछली विधानसभा में महाबल मिश्रा के बेटे विनय मिश्रा तक की चुनाव में हार हुई।

Thursday, 1 January 2015

पूर्वांचल विकास मोर्चा की तरफ से आप सबको नया साल 2015 की हार्दिक शुभकामनायें

नए साल 2015  शुरू हो चुका है।  2014 इतिहास बन चुका है, लेकिन गुजरे साल ने कई ऐसे संकेत दिए हैं, जिनके आधार पर नया साल अच्‍छा रहने की उम्‍मीद जताई जा सकती है। 

ज़िंदगी का फलसफा भी कितना अजीब है;
शामें कटती नहीं और साल गुज़रते चले जा रहे हैं।
नया साल मुबारक़!



पूर्वांचल विकास मोर्चा की तरफ से आप सबको नया साल 2015 की हार्दिक शुभकामनायें । नूतन बर्ष आपके एवं आपके परिवार के लिए हर्षोल्लास,अच्छा स्वास्थ्य,सम्पन्नता ,सुरक्षा, नव ज्योत्स्ना,नव उल्लास और समृधि लेकर आए ।

Wednesday, 24 December 2014

महान विभूति को सर्वोच्च सम्मान


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। केंद्रीय कैबिनेट ने दोनों को यह सम्मान देने का फैसला 25 दिसंबर को वाजपेयी के 90वें जन्मदिन से एक दिन पहले किया है। मालवीय का जन्मदिन भी 25 दिसंबर को ही पड़ता है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति बेहद हर्ष के साथ पंडित मदन मोहन मालवीय ( मरणोपरांत) और अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित करते हैं।


इस निर्णय के बाद भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वालों की संख्या 45 हो गई है। पिछले वर्ष क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और वैज्ञानिक सीएनआर राव को इस सम्मान के लिए चुना गया था। 1998 से 2004 के बीच देश के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी अपनी उम्र संबंधी अस्वस्थता के चलते पिछले कुछ समय से सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। उन्हें एक महान राजनेता और अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है जिसका विरोधी भी सम्मान करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न सम्मान दिए जाने की घोषणा पर खुशी जताई है। वाजपेयी को कई ठोस पहल करने का श्रेय दिया जाता है जिनमें भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों को कम करने का उनका प्रयास, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। वाजपेयी, कांग्रेस पार्टी से बाहर के पहले ऐसे नेता हैं जो सबसे अधिक लंबे समय तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे। वाजपेयी के आलोचकों ने भी उन्हें आरएसएस का ‘‘मुखौटा’’ मानने के बावजूद उनके बारे में हमेशा अच्छी बातें कहीं। घोषणा का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, श्श्पंडित मदन मोहन मालवीय और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाना बेहद खुशी की बात है। इन महान विभूतियों को देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जाना राष्ट्र सेवा में उनके योगदान का उचित मान्यता है।’’ उन्होंने कहा, श्श्अटलजी हर किसी के प्रिय हैं। एक पथप्रदर्शक, एक प्रेरणा और दिग्गजों के बीच दिग्गज हैं। भारत के प्रति उनका योगदान अतुलनीय है।’’ मालवीय के बारे में मोदी ने कहा, श्श्पंडित मदन मोहन मालवीय को एक असाधारण विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने लोगों के बीच में राष्ट्रीय चेतना की ज्योति प्रज्ज्वलित की।’’ वाजपेयी को देश के महान वक्ताओं में से एक बताते हुए केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और दक्षिणपूर्वी एशिया में शांति के प्रति प्रतिबद्ध रहे। तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और जदयू नेता नीतीश कुमार ने भी इस फैसले का स्वागत किया। कांग्रेस ने भी वाजपेयी और मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किए जाने की घोषणा का स्वागत किया, लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि राजग सरकार इन दोनों द्वारा दिखाये गये ‘‘राज धर्म’’ और ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ के पथ का अनुसरण करेगी। पार्टी ने यह टिप्पणी संभवतरू 2002 के गुजरात दंगों के समय मोदी को ‘‘राजधर्म’ का पालन करने की वाजपेयी की सलाह के संदर्भ की।
महामना मदन मोहन मालवीय का व्यक्तित्व बहुत ही अद्भुत था। जीवन को कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां उन्होंने अपनी विद्वता का अद्भुत व अतुलनीय प्रदर्शन न किया हो। पत्रकारिता के क्षेत्र में मालवीय जी के व्यक्तित्व का समग्र रूप हमें दिखाई देता है। मालवीय जी का पत्रकारिता व लेखन कार्य का शुभारंभ सन् 1907 में हुआ। जब बसंत पंचमी के दिन उन्होंने अपने राजनैतिक और सांस्कृतिक विचारों के प्रसार के लिए अभ्युदय नाम का साप्ताहिक पत्र निकालना प्रारंभ किया। उन्होंने दो वर्ष पत्र का स्वयं संपादन किया। उनके संपादकत्व में श्अभ्युदयश् सदा निःस्वार्थ निर्भीक और नम्र रहा। अमीर और गरीब सभी के लिए अभ्युदय समान रहा। शिष्टाचार को अभ्युदय ने कभी नहीं छोड़ा। एक सच्चे ब्राह्मण के रूप में जो उपदेश उन्होंने दिये उसमें भारतीय आत्मा और संस्कृति बसती थी। सन् 1909 में मालवीय जी ने अपने मित्रों के सहयोग से विजयादशमी के दिन 24 अक्टूबर से अंग्रेजी दैनिक लीडर का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस कार्य में मोती लाल नेहरू ने भी योगदान दिया। लगभग 10 वर्षों तक लीडर ने निःस्वार्थ भाव बड़े लगन से सेवा की। मालवीय जी के लेखों में सच्ची देशभक्ति स्वदेशी की भावना सच्ची राजभक्ति राष्ट्रीयता, स्वराज्य पर स्पष्ट रूप से विचार परिलक्षित होते हैं। उन्हीं के अथक प्रयासों से ही 1910 में हिंदी पाक्षिक मर्यादा प्रयाग से निकलना प्रारंभ हुआ। 1933 में हिंदी साप्ताहिक सनातन धर्म के संस्थापक तथा कुछ वर्षों तक इन पत्रों के संपादक रहे। यह मालवीय जी के प्रयासों का ही परिणाम था कि हिंदुस्तान का हिंदी संस्करण भी 1936 में प्रारंभ हो गया। सन 1910 के प्रारंभ में ही मालवीयजी ने डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल तीन-चार दिन की सूचना के बाद शीघ्रता से विधेयक को पास कराना अनुचित है। 6 अगस्त 1910 को मालवीय जी ने प्रेस विधेयक के विरोध में भाषण दिया था। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मौलिकता एवं नवीनता के मानदंड स्थापित किये। लेखन में उनकी विशिष्ट भाषा शैली थी। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे।
अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत-पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है। अपने इन ठोस कदमों के साथ वह भाजपा के ‘राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे’ से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। कांग्रेस के बाहर देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है। उनके आलोचक हालांकि उन्हें आरएसएस का ऐसा ‘‘मुखौटा’’ बताते रहे हैं जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है। 1999 की वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा की उनकी ही पार्टी के ‘कट्टरवादी नेताओं’ ने आलोचना की थी लेकिन वह बस पर सवार होकर किसी विजेता की तरह लाहौर पहुंचे। वाजपेयी की इस राजनयिक सफलता को भारत-पाक संबंधों में एक नए युग की शुरूआत की संज्ञा देकर सराहा गया। लेकिन यह दूसरी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने गुपचुप अभियान के जरिए अपने सैनिकों की कारगिल में घुसपैठ करायी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच छिड़े संघर्ष में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।
भाजपा के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन संख्या बल में मात खाने से उनकी सरकार महज 13 दिन ही चल सकी। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुकाछिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरूआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई। अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण वाजपेयी सरकार धराशायी हो गयी। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही कहिए कि भाजपा को अपने मूल से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिर प्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर जवाहरलाल नेहरू की शैली और स्तर के नेता के रूप में सम्मान पाने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998.99 का कार्यकाल साहसिक और दृढ़निश्चयी फैसलों के वर्ष के रूप में जाना जाता है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में श्रृंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए। वाजपेयी के करीबी लोगों का कहना है कि उनका मिशन पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारना था और इसके बीज उन्होंने 70 के दशक में मोरारजी देसाई की सरकार में बतौर विदेश मंत्री रहते हुए ही रोपे थे। लाहौर शांति उपायों के विफल रहने के बाद वर्ष 2001 में वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ ऐतिहासिक आगरा शिखर वार्ता की एक और पहल की लेकिन वह भी विफल रही।
छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी के विश्वासपात्र सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी और अधिकतर भाजपा नेताओं ने विध्वंस का समर्थन किया लेकिन वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की। उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं किए गए लेकिन हथियार रिश्वत कांडों ने उनकी सरकार में भ्रष्टाचार को उजागर किया और ऐसा वक्त भी आया जब उनके फैसलों पर शकांए जाहिर की गयीं।
वाजपेयी एक जाने माने कवि भी हैं और उनके पार्टी सहयोगी अक्सर उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं। 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उनका जन्म हुआ। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन का विरोध करने के लिए किशोरावस्था में वाजपेयी कुछ समय के लिए जेल गए लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने कोई मुख्य भूमिका अदा नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जन संघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए। बाद में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ाव के बाद जनसंघ और तत्पश्चात भाजपा के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की शुरूआत हुई। 1950 के दशक की शुरूआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमायीं और भाजपा की उदारवादी आवाज बनकर उभरे।

देश के सर्वाधिक करिश्माई नेता अटल बिहारी वाजपेयी

भारत के सर्वाधिक करिश्माई नेताओं में शुमार अटल बिहारी वाजपेयी का देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसे विशाल व्यक्तित्व वाले राजनेता के रूप में सम्मान किया जाता है जिनकी व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता है और जिन्होंने तमाम अवरोधों को तोड़ते हुए 90 के दशक में राजनीति के मुख्य मंच पर भाजपा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसे वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही आकर्षण ही कहा जाएगा कि नए सहयोगी दल उस भाजपा के साथ जुड़ते गए जिसे अपने दक्षिणपंथी झुकाव के कारण उस जमाने, खासतौर से बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राजनीतिक रूप से ‘अछूत’ माना जाता था। अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत. पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है। अपने इन ठोस कदमों के साथ वह भाजपा के ‘राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे’ से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं।

कांग्रेस के बाहर देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है। उनके आलोचक हालांकि उन्हें आरएसएस का ऐसा ‘मुखौटा’ बताते रहे हैं जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है। 1999 की वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा की उनकी ही पार्टी के ‘कट्टरवादी नेताओं’ ने आलोचना की थी लेकिन वह बस पर सवार होकर किसी विजेता की तरह लाहौर पहुंचे।

वाजपेयी की इस राजनयिक सफलता को भारत-पाक संबंधों में एक नए युग की शुरूआत की संज्ञा देकर सराहा गया। लेकिन यह दूसरी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने गुपचुप अभियान के जरिए अपने सैनिकों की कारगिल में घुसपैठ करायी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच छिड़े संघर्ष में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।

भाजपा के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन संख्या बल में मात खाने से उनकी सरकार महज 13 दिन ही चल सकी। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुकाछिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरूआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई।

अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण वाजपेयी सरकार धराशायी हो गई। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही कहिए कि भाजपा को अपने मूल से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिर प्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर जवाहरलाल नेहरू की शैली और स्तर के नेता के रूप में सम्मान पाने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998. 99 का कार्यकाल साहसिक और दृढ़निश्चयी फैसलों के वर्ष के रूप में जाना जाता है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में श्रंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए।

वाजपेयी के करीबी लोगों का कहना है कि उनका मिशन पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारना था और इसके बीज उन्होंने 70 के दशक में मोरारजी देसाई की सरकार में बतौर विदेश मंत्री रहते हुए ही रोपे थे। लाहौर शांति उपायों के विफल रहने के बाद वर्ष 2001 में वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ ऐतिहासिक आगरा शिखर वार्ता की एक और पहल की लेकिन वह भी विफल रही।

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी के विश्वासपात्र सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी और अधिकतर भाजपा नेताओं ने विध्वंस का समर्थन किया लेकिन वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की।

उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं किए गए लेकिन हथियार रिश्वत कांडों ने उनकी सरकार में भ्रष्टाचार को उजागर किया और ऐसा वक्त भी आया जब उनके फैसलों पर शकांए जाहिर की गईं। वाजपेयी एक जाने माने कवि भी हैं और उनके पार्टी सहयोगी अक्सर उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं।

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उनका जन्म हुआ। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन का विरोध करने के लिए किशोरावस्था में वाजपेयी कुछ समय के लिए जेल गए लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने कोई मुख्य भूमिका अदा नहीं की।

हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जन संघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए। बाद में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ाव के बाद जनसंघ और तत्पश्चात भाजपा के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की शुरूआत हुई। 1950 के दशक की शुरुआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमाईं और भाजपा की उदारवादी आवाज बनकर उभरे।

राजनीति में वाजपेयी की शुरुआत 1942-45 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई थी। उन्होंने कम्युनिस्ट के रूप में शुरूआत की लेकिन हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता के लिए साम्यवाद को छोड़ दिया। संघ को भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी माना जाता है। इसी दौरान वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी के करीबी अनुयायी और सहयोगी बन गए।

जब मुखर्जी ने 1953 में कश्मीर में राज्य में प्रवेश के लिए परमिट लेने की व्यवस्था के खिलाफ आमरण अनशन किया तो वाजपेयी उनके साथ थे। मुखर्जी ने परमिट व्यवस्था को कश्मीर की यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों के साथ ‘तुच्छ’ व्यवहार करार दिया था। साथ ही उन्होंने मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने के खिलाफ भी आमरण अनशन किया था।

मुखर्जी के अनशन और विरोध की परिणति परमिट व्यवस्था समाप्त करने और कश्मीर के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया तेज किए जाने के रूप में हुई। लेकिन कई सप्ताह की जेलबंदी, बीमारी और कमजोरी के चलते मुखर्जी का निधन हो गया। इन सारी घटनाओं ने युवा वाजपेयी के मन पर गहरी छाप छोड़ी। मुखर्जी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वाजपेयी ने 1957 में अपना पहला चुनाव लड़ा और जीता।

भारतीय जनसंघ के नेता के रूप में उन्होंने इसके राजनीतिक दायरे, संगठन और एजेंडे का विस्तार किया। अपनी युवावस्था के बावजूद वाजपेयी जल्द ही विपक्ष में एक सम्मानित हस्ती बन गए जिनकी तर्कशक्ति और बुद्धिमत्ता के उनके विरोधी भी कायल होने लगे। उनकी व्यापक अपील ने उभरते राष्ट्रवादी सांस्कृतिक आंदोलन को सम्मान, पहचान और स्वीकार्यता दिलाई।