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Thursday, 22 January 2015

जिनपर की राजनीति, उन्हीं के हाथ रह गए खाली

भाजपा की सूची जारी होने के बाद दिल्ली में रहने वाले प्रवासी पूर्वांचली खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
वे इस बात को लेकर हैं नाराज है कि संख्या के आधार पर उन्हें पार्टी ने तरजीह नहीं दी। इतना ही नहीं वैसे लोगों को टिकट दे दिया है जो सदस्यता अभियान में भी सक्रिय नहीं रहे। इस बार पूर्वाचलियों को 70 सीटों में से महज 2 प्रत्याशियों को टिकट मिला है। 

पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में पूर्वांचलियों की ताकत को समझा था और जितने पूर्वांचलियों को अरविंद की पार्टी ने टिकट दिया था, उनमें से ज्‍यादातर जीतने में सफल रहे थे। भाजपा ने भी पूर्वाचलियों की ताकत को समझा था और पहली बार 5 पूर्वाचलियों को विधानसभा का टिकट दिया था, जिसमें से ज्‍यादातर जीतने में सफल रहे थे। इसी जीत के बाद दिल्‍ली के पूर्वांचली मतदाता भाजपा के लिए महत्‍वपूर्ण हो गए और उसने भोजपुरी के सबसे बडे स्‍टार मनोज तिवारी को उत्‍तर-पूर्वी दिल्‍ली से सांसद बनाया।
मनोज तिवारी तो जीतने में सफल रहे ही, उनका असर अन्‍य सीटों पर भी पड़ा और पूर्वाचली मतदाता गोलबंद होकर भाजपा के पीछे एकजुट हो गया, जिसका परिणाम सामने है। दिल्‍ली में भाजपा ने सबसे पहले पूर्वांचल से लालबिहारी तिवारी को लोकसभा का टिकट दिया था और आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि उस वर्ष भाजपा सातों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही थी। लालबिहारी तिवारी के कारण दिल्‍ली के सभी सीटों पर पूर्वांचली मतदाता भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो गए थे। लेकिन जब से भाजपा ने पंजाबी-बनिया लॉबी के कारण एक मात्र पूर्वांचली लालबिहारी तिवारी को किनारे लगाया, भाजपा दिल्‍ली में सत्‍ता से दूर होती चली गई। लोकसभा-2014 में भाजपा ने इस गलती को सुधारा और मनोज तिवारी को टिकट दियाा असर देखिए कि फिर एक बार भाजपा दिल्‍ली की सातों लोकसभा सीट जीतने में सफल रही।

छठ पर्व पर दिल्‍ली से बिहार व पूर्वी उप्र की ओर जाने वाली रेलगाडि़यों की संख्‍या के हिसाब से दिल्‍ली में करीब 40 लाख पूर्वांचली मतदाता हैं। कांग्रेस ने केवल एक महाबल मिश्रा के परिवार तक पूर्वांचल को सीमित कर दिया, जिसका शुरु में तो लाभ हुआ, लेकिन अंत में कांग्रेस को बेहद नुकसान हुआ। महाबल मिश्रा को पार्षद, विधायक और 2009 में लोकसभा का उम्‍मीदवार बनाने के कारण लगातार 15 साल कांग्रेस की सरकार रही और पहली बार कांग्रेस 2009 में सातों लोकसभा सीटें जीतने में भी सफल रही थी। लेकिन महाबल मिश्रा के परिवारवाद के कारण पूर्वांचल की जनता कांग्रेस से दूर होती चली गई, जिसका खामियाजा कांग्रेस को बुरी तरह से उठाना पड़ा। यहां तक कि पिछली विधानसभा में महाबल मिश्रा के बेटे विनय मिश्रा तक की चुनाव में हार हुई।

Thursday, 1 January 2015

पूर्वांचल विकास मोर्चा की तरफ से आप सबको नया साल 2015 की हार्दिक शुभकामनायें

नए साल 2015  शुरू हो चुका है।  2014 इतिहास बन चुका है, लेकिन गुजरे साल ने कई ऐसे संकेत दिए हैं, जिनके आधार पर नया साल अच्‍छा रहने की उम्‍मीद जताई जा सकती है। 

ज़िंदगी का फलसफा भी कितना अजीब है;
शामें कटती नहीं और साल गुज़रते चले जा रहे हैं।
नया साल मुबारक़!



पूर्वांचल विकास मोर्चा की तरफ से आप सबको नया साल 2015 की हार्दिक शुभकामनायें । नूतन बर्ष आपके एवं आपके परिवार के लिए हर्षोल्लास,अच्छा स्वास्थ्य,सम्पन्नता ,सुरक्षा, नव ज्योत्स्ना,नव उल्लास और समृधि लेकर आए ।

Wednesday, 24 December 2014

महान विभूति को सर्वोच्च सम्मान


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। केंद्रीय कैबिनेट ने दोनों को यह सम्मान देने का फैसला 25 दिसंबर को वाजपेयी के 90वें जन्मदिन से एक दिन पहले किया है। मालवीय का जन्मदिन भी 25 दिसंबर को ही पड़ता है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति बेहद हर्ष के साथ पंडित मदन मोहन मालवीय ( मरणोपरांत) और अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित करते हैं।


इस निर्णय के बाद भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वालों की संख्या 45 हो गई है। पिछले वर्ष क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और वैज्ञानिक सीएनआर राव को इस सम्मान के लिए चुना गया था। 1998 से 2004 के बीच देश के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी अपनी उम्र संबंधी अस्वस्थता के चलते पिछले कुछ समय से सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। उन्हें एक महान राजनेता और अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है जिसका विरोधी भी सम्मान करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न सम्मान दिए जाने की घोषणा पर खुशी जताई है। वाजपेयी को कई ठोस पहल करने का श्रेय दिया जाता है जिनमें भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों को कम करने का उनका प्रयास, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। वाजपेयी, कांग्रेस पार्टी से बाहर के पहले ऐसे नेता हैं जो सबसे अधिक लंबे समय तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे। वाजपेयी के आलोचकों ने भी उन्हें आरएसएस का ‘‘मुखौटा’’ मानने के बावजूद उनके बारे में हमेशा अच्छी बातें कहीं। घोषणा का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, श्श्पंडित मदन मोहन मालवीय और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाना बेहद खुशी की बात है। इन महान विभूतियों को देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जाना राष्ट्र सेवा में उनके योगदान का उचित मान्यता है।’’ उन्होंने कहा, श्श्अटलजी हर किसी के प्रिय हैं। एक पथप्रदर्शक, एक प्रेरणा और दिग्गजों के बीच दिग्गज हैं। भारत के प्रति उनका योगदान अतुलनीय है।’’ मालवीय के बारे में मोदी ने कहा, श्श्पंडित मदन मोहन मालवीय को एक असाधारण विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने लोगों के बीच में राष्ट्रीय चेतना की ज्योति प्रज्ज्वलित की।’’ वाजपेयी को देश के महान वक्ताओं में से एक बताते हुए केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और दक्षिणपूर्वी एशिया में शांति के प्रति प्रतिबद्ध रहे। तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और जदयू नेता नीतीश कुमार ने भी इस फैसले का स्वागत किया। कांग्रेस ने भी वाजपेयी और मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किए जाने की घोषणा का स्वागत किया, लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि राजग सरकार इन दोनों द्वारा दिखाये गये ‘‘राज धर्म’’ और ‘‘धर्मनिरपेक्षता’’ के पथ का अनुसरण करेगी। पार्टी ने यह टिप्पणी संभवतरू 2002 के गुजरात दंगों के समय मोदी को ‘‘राजधर्म’ का पालन करने की वाजपेयी की सलाह के संदर्भ की।
महामना मदन मोहन मालवीय का व्यक्तित्व बहुत ही अद्भुत था। जीवन को कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां उन्होंने अपनी विद्वता का अद्भुत व अतुलनीय प्रदर्शन न किया हो। पत्रकारिता के क्षेत्र में मालवीय जी के व्यक्तित्व का समग्र रूप हमें दिखाई देता है। मालवीय जी का पत्रकारिता व लेखन कार्य का शुभारंभ सन् 1907 में हुआ। जब बसंत पंचमी के दिन उन्होंने अपने राजनैतिक और सांस्कृतिक विचारों के प्रसार के लिए अभ्युदय नाम का साप्ताहिक पत्र निकालना प्रारंभ किया। उन्होंने दो वर्ष पत्र का स्वयं संपादन किया। उनके संपादकत्व में श्अभ्युदयश् सदा निःस्वार्थ निर्भीक और नम्र रहा। अमीर और गरीब सभी के लिए अभ्युदय समान रहा। शिष्टाचार को अभ्युदय ने कभी नहीं छोड़ा। एक सच्चे ब्राह्मण के रूप में जो उपदेश उन्होंने दिये उसमें भारतीय आत्मा और संस्कृति बसती थी। सन् 1909 में मालवीय जी ने अपने मित्रों के सहयोग से विजयादशमी के दिन 24 अक्टूबर से अंग्रेजी दैनिक लीडर का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस कार्य में मोती लाल नेहरू ने भी योगदान दिया। लगभग 10 वर्षों तक लीडर ने निःस्वार्थ भाव बड़े लगन से सेवा की। मालवीय जी के लेखों में सच्ची देशभक्ति स्वदेशी की भावना सच्ची राजभक्ति राष्ट्रीयता, स्वराज्य पर स्पष्ट रूप से विचार परिलक्षित होते हैं। उन्हीं के अथक प्रयासों से ही 1910 में हिंदी पाक्षिक मर्यादा प्रयाग से निकलना प्रारंभ हुआ। 1933 में हिंदी साप्ताहिक सनातन धर्म के संस्थापक तथा कुछ वर्षों तक इन पत्रों के संपादक रहे। यह मालवीय जी के प्रयासों का ही परिणाम था कि हिंदुस्तान का हिंदी संस्करण भी 1936 में प्रारंभ हो गया। सन 1910 के प्रारंभ में ही मालवीयजी ने डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल तीन-चार दिन की सूचना के बाद शीघ्रता से विधेयक को पास कराना अनुचित है। 6 अगस्त 1910 को मालवीय जी ने प्रेस विधेयक के विरोध में भाषण दिया था। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मौलिकता एवं नवीनता के मानदंड स्थापित किये। लेखन में उनकी विशिष्ट भाषा शैली थी। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे।
अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत-पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है। अपने इन ठोस कदमों के साथ वह भाजपा के ‘राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे’ से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। कांग्रेस के बाहर देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है। उनके आलोचक हालांकि उन्हें आरएसएस का ऐसा ‘‘मुखौटा’’ बताते रहे हैं जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है। 1999 की वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा की उनकी ही पार्टी के ‘कट्टरवादी नेताओं’ ने आलोचना की थी लेकिन वह बस पर सवार होकर किसी विजेता की तरह लाहौर पहुंचे। वाजपेयी की इस राजनयिक सफलता को भारत-पाक संबंधों में एक नए युग की शुरूआत की संज्ञा देकर सराहा गया। लेकिन यह दूसरी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने गुपचुप अभियान के जरिए अपने सैनिकों की कारगिल में घुसपैठ करायी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच छिड़े संघर्ष में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।
भाजपा के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन संख्या बल में मात खाने से उनकी सरकार महज 13 दिन ही चल सकी। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुकाछिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरूआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई। अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण वाजपेयी सरकार धराशायी हो गयी। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही कहिए कि भाजपा को अपने मूल से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिर प्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर जवाहरलाल नेहरू की शैली और स्तर के नेता के रूप में सम्मान पाने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998.99 का कार्यकाल साहसिक और दृढ़निश्चयी फैसलों के वर्ष के रूप में जाना जाता है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में श्रृंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए। वाजपेयी के करीबी लोगों का कहना है कि उनका मिशन पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारना था और इसके बीज उन्होंने 70 के दशक में मोरारजी देसाई की सरकार में बतौर विदेश मंत्री रहते हुए ही रोपे थे। लाहौर शांति उपायों के विफल रहने के बाद वर्ष 2001 में वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ ऐतिहासिक आगरा शिखर वार्ता की एक और पहल की लेकिन वह भी विफल रही।
छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी के विश्वासपात्र सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी और अधिकतर भाजपा नेताओं ने विध्वंस का समर्थन किया लेकिन वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की। उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं किए गए लेकिन हथियार रिश्वत कांडों ने उनकी सरकार में भ्रष्टाचार को उजागर किया और ऐसा वक्त भी आया जब उनके फैसलों पर शकांए जाहिर की गयीं।
वाजपेयी एक जाने माने कवि भी हैं और उनके पार्टी सहयोगी अक्सर उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं। 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उनका जन्म हुआ। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन का विरोध करने के लिए किशोरावस्था में वाजपेयी कुछ समय के लिए जेल गए लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने कोई मुख्य भूमिका अदा नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जन संघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए। बाद में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ाव के बाद जनसंघ और तत्पश्चात भाजपा के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की शुरूआत हुई। 1950 के दशक की शुरूआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमायीं और भाजपा की उदारवादी आवाज बनकर उभरे।

देश के सर्वाधिक करिश्माई नेता अटल बिहारी वाजपेयी

भारत के सर्वाधिक करिश्माई नेताओं में शुमार अटल बिहारी वाजपेयी का देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसे विशाल व्यक्तित्व वाले राजनेता के रूप में सम्मान किया जाता है जिनकी व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता है और जिन्होंने तमाम अवरोधों को तोड़ते हुए 90 के दशक में राजनीति के मुख्य मंच पर भाजपा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसे वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही आकर्षण ही कहा जाएगा कि नए सहयोगी दल उस भाजपा के साथ जुड़ते गए जिसे अपने दक्षिणपंथी झुकाव के कारण उस जमाने, खासतौर से बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राजनीतिक रूप से ‘अछूत’ माना जाता था। अपनी वाणी के ओज और ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को भारत. पाकिस्तान मतभेदों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने का श्रेय दिया जाता है। अपने इन ठोस कदमों के साथ वह भाजपा के ‘राष्ट्रवादी राजनीतिक एजेंडे’ से परे जाकर एक व्यापक फलक के राजनेता के रूप में जाने जाते हैं।

कांग्रेस के बाहर देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर भाजपा का उदारवादी चेहरा कहा जाता है। उनके आलोचक हालांकि उन्हें आरएसएस का ऐसा ‘मुखौटा’ बताते रहे हैं जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदुवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है। 1999 की वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा की उनकी ही पार्टी के ‘कट्टरवादी नेताओं’ ने आलोचना की थी लेकिन वह बस पर सवार होकर किसी विजेता की तरह लाहौर पहुंचे।

वाजपेयी की इस राजनयिक सफलता को भारत-पाक संबंधों में एक नए युग की शुरूआत की संज्ञा देकर सराहा गया। लेकिन यह दूसरी बात है कि पाकिस्तानी सेना ने गुपचुप अभियान के जरिए अपने सैनिकों की कारगिल में घुसपैठ करायी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच छिड़े संघर्ष में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी।

भाजपा के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने लेकिन संख्या बल में मात खाने से उनकी सरकार महज 13 दिन ही चल सकी। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुकाछिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरूआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई।

अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के कारण वाजपेयी सरकार धराशायी हो गई। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही कहिए कि भाजपा को अपने मूल से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिर प्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर जवाहरलाल नेहरू की शैली और स्तर के नेता के रूप में सम्मान पाने वाले वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में 1998. 99 का कार्यकाल साहसिक और दृढ़निश्चयी फैसलों के वर्ष के रूप में जाना जाता है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में श्रंखलाबद्ध परमाणु परीक्षण किए।

वाजपेयी के करीबी लोगों का कहना है कि उनका मिशन पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारना था और इसके बीज उन्होंने 70 के दशक में मोरारजी देसाई की सरकार में बतौर विदेश मंत्री रहते हुए ही रोपे थे। लाहौर शांति उपायों के विफल रहने के बाद वर्ष 2001 में वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ ऐतिहासिक आगरा शिखर वार्ता की एक और पहल की लेकिन वह भी विफल रही।

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी के विश्वासपात्र सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी और अधिकतर भाजपा नेताओं ने विध्वंस का समर्थन किया लेकिन वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की।

उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं किए गए लेकिन हथियार रिश्वत कांडों ने उनकी सरकार में भ्रष्टाचार को उजागर किया और ऐसा वक्त भी आया जब उनके फैसलों पर शकांए जाहिर की गईं। वाजपेयी एक जाने माने कवि भी हैं और उनके पार्टी सहयोगी अक्सर उनकी रचनाओं को उद्धृत करते हैं।

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उनका जन्म हुआ। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। वाजपेयी का संसदीय अनुभव पांच दशकों से भी अधिक का विस्तार लिए हुए है। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन का विरोध करने के लिए किशोरावस्था में वाजपेयी कुछ समय के लिए जेल गए लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने कोई मुख्य भूमिका अदा नहीं की।

हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जन संघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए। बाद में दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ाव के बाद जनसंघ और तत्पश्चात भाजपा के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों की शुरूआत हुई। 1950 के दशक की शुरुआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमाईं और भाजपा की उदारवादी आवाज बनकर उभरे।

राजनीति में वाजपेयी की शुरुआत 1942-45 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई थी। उन्होंने कम्युनिस्ट के रूप में शुरूआत की लेकिन हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता के लिए साम्यवाद को छोड़ दिया। संघ को भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथी माना जाता है। इसी दौरान वाजपेयी भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी के करीबी अनुयायी और सहयोगी बन गए।

जब मुखर्जी ने 1953 में कश्मीर में राज्य में प्रवेश के लिए परमिट लेने की व्यवस्था के खिलाफ आमरण अनशन किया तो वाजपेयी उनके साथ थे। मुखर्जी ने परमिट व्यवस्था को कश्मीर की यात्रा करने वाले भारतीय नागरिकों के साथ ‘तुच्छ’ व्यवहार करार दिया था। साथ ही उन्होंने मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने के खिलाफ भी आमरण अनशन किया था।

मुखर्जी के अनशन और विरोध की परिणति परमिट व्यवस्था समाप्त करने और कश्मीर के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया तेज किए जाने के रूप में हुई। लेकिन कई सप्ताह की जेलबंदी, बीमारी और कमजोरी के चलते मुखर्जी का निधन हो गया। इन सारी घटनाओं ने युवा वाजपेयी के मन पर गहरी छाप छोड़ी। मुखर्जी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वाजपेयी ने 1957 में अपना पहला चुनाव लड़ा और जीता।

भारतीय जनसंघ के नेता के रूप में उन्होंने इसके राजनीतिक दायरे, संगठन और एजेंडे का विस्तार किया। अपनी युवावस्था के बावजूद वाजपेयी जल्द ही विपक्ष में एक सम्मानित हस्ती बन गए जिनकी तर्कशक्ति और बुद्धिमत्ता के उनके विरोधी भी कायल होने लगे। उनकी व्यापक अपील ने उभरते राष्ट्रवादी सांस्कृतिक आंदोलन को सम्मान, पहचान और स्वीकार्यता दिलाई।

Thursday, 30 October 2014

सरदार पटेल की जयंती यानी राष्ट्रीय एकता दिवस



नरेंद्र मोदी सरकार ने देश को एकजुट करने के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयास के प्रति श्रद्धांजलि के तौरपर उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया है।सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि देने संबंधी कार्यक्रम यहां संसद मार्ग के पटेल चौक पर किया जाएगा। सभी बड़े शहरों, जिला मुख्यालय शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य स्थानों पर भी ‘रन फॉर यूनिटी’ का आयोजन किया जाएगा जिसमें समाज के सभी वर्ग खासकर कॉलेज, एनसीसी और एनएसएस के युवक हिस्सा लेंगे। राष्ट्रीय राजधानी में राजपथ पर विजय चौक से इंडिया गेट तक ‘रन फॉन यूनिटी’ आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर सभी सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों एवं अन्य संस्थानों में शपथ ग्रहण समारोह का भी आयोजन किया जाएगा। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह अवसर हमारे राष्ट्र को एकता, अखंडता, तथा सुरक्षा के सामने खड़े वास्तविक एवं भारी खतरों के प्रति अपनी ताकत एवं दृढता के प्रति फिर से निश्चय प्रकट करने का मौका प्रदान करेगा।
सभी जिलों में एकता दिवस मनाने की तैयारियां की जा रही है। 31 अक्तूबर को लौह पुरूष के जन्मदिन को खास बनाने की तैयारी है। इस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन और देश के एकीकरण में सरदार पटेल के योगदान पर व्याख्यान भी आयोजित किए जाएंगे। स्कूलों की छात्र-छात्राएं हाथों में राष्ट्रीय एकता दिवस का बैनर लिए मार्च पास्ट भी करेंगे। इस दिन छात्र-छात्राओं के लिए स्कूल कैम्पस में स्वतंत्रता संग्राम पर क्विज प्रतियोगिता,पेंटिंग व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा। सभी सरकारी कार्यालय, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और अन्‍य सार्वजनिक संस्‍थान राष्‍ट्रीय एकता दिवस मनाने के लिए शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन करेंगे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय से यह अनुरोध किया गया है कि वे स्‍कूलों और कॉलेजों के छात्रों को देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने के प्रयास करने के लिए प्रेरित करने हेतु राष्‍ट्रीय एकता दिवस पर शपथ दिलाने के लिए उपयुक्‍त दिशा-निर्देश जारी करें।
भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों और सभी राज्‍य सरकारों/केन्‍द्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों से इस अवसर पर ‘शपथ ग्रहण समारोह’, समाज के सभी वर्गों के लोगों को शामिल करते हुए ‘एकता के लिए दौड़’, संध्‍या में पुलिस, केन्‍द्रीय सशस्‍त्र पुलिस बलों और अन्‍य संगठनों जैसे राष्‍ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी), राष्‍ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस), स्‍काउट एवं गाइड और होम गार्ड द्वारा मार्च पास्‍ट आदि सहित उचित तरीकों से उपयुक्‍त कार्यक्रमों का आयोजन करने का अनुरोध किया गया है।

Monday, 27 October 2014

आशा और विश्वास का महापर्व छठ


संतान सुख की आशा और छठ मइया पर विश्वास के साथ व्रती 48 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। इसी आस्था के साथ घाटों पर भीड़ उमड़ती है। इसे लेकर तैयारी शुरू हो गई है। सूर्य उपासना का पर्व डाला छठ सोमवार से शुरू हो गया। महिलाओं ने सायंकाल चने की दाल, लौकी की सब्जी तथा हाथ की चक्की से पीसे आटे की पूड़ी खाया। मंगलवार को खरना है। इस दिन दिन में व्रत रखकर सायंकाल रोटी व गन्ने का रस अथवा गुड़ की बनी खीर खाएंगी। चार दिवसीय इस पर्व को लेकर महिलाओं में उत्साह देखा जा रहा है। प्रथम दिन से ही सूर्य की पूजा शुरू हो गई है। चार दिवसीय इस पर्व की तैयारी भी व्यापक रूप से की जा रही है। पर्व में प्रयुक्त होने वाले सामानों की अस्थाई दुकानें भी लग गई हैं। वहां खरीदने के लिए महिलाओं की भीड़ पहुंच रही है। सूप, दौरी, चलनी के अलावा मिट्टी के पात्रों की भी खूब खरीदारी की जा रही है। यह खरीदारी देर रात तक होती है, इसलिए शहर ही नहीं गांवों के बाजार तथा कस्बों में भी चहल-पहल बढ़ गई है।

इस दिन व्रतधारी दिनभर उपवास करते हैं और शाम में भगवान सूर्य को खीर-पूड़ी, पान-सुपारी और केले का भोग लगाने के बाद खुद खाते हैं. यह व्रत काफी कठिन होता है. पूरी पूजा के दौरान किसी भी तरह की आवाज नहीं होनी चाहिए. खासकर जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर रही होती है और कोई आवाज हो जाती हो तो खाना वहीं छोड़ना पड़ता है और उसके बाद छठ के खत्म होने पर ही वह मुंह में कुछ डाल सकती है. इससे पहले एक खर यानी तिनका भी मुंह में नहीं डाल सकती इसलिए इसे खरना कहा जाता है. खरना के दिन खीर के प्रसाद का खास महत्व है और इसे तैयार करने का तरीका भी अलग है. मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर यह खीर तैयार की जाती है. प्रसाद बन जाने के बाद शाम को सूर्य की आराधना कर उन्हें भोग लगाया जाता है और फिर व्रतधारी प्रसाद ग्रहण करती है. इस पूरी प्रक्रिया में नियम का विशेष महत्व होता है. शाम में प्रसाद ग्रहण करने के समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कहीं से कोई आवाज नहीं आए. ऐसा होने पर खाना छोड़कर उठना पड़ता है.
छठ, सूर्य की आराधना का पर्व है। वैदिक ग्रन्थ में सूर्य को देवता मानकर विशेष स्थान दिया गया है। प्रात: काल में सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण का नमन किया जाता है। सूर्य की उपासना भारतीय समाज में ऋग्वैदिक काल से होती आ रही है। सूर्य की उपासना के महत्व को विष्णु,भागवत और ब्र±ा पुराण में बताया गया है। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार षष्ठी को एक विशेष खौगोलीय घटना होती है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है। इसके संभावित कुप्रभाव से रक्षा करने का सामथ्र्य पूजा पाठ में होता है।
छठ पर्व की शुरूवात को लेकर अनेक कथानक हैं। आध्यात्मिक कथा के अनुसार ब्रह्मा की मानस पुत्री प्रकृति देवी की आराधना कर संतान की रक्षा की कामना की जाती है। कार्तिक मास की षष्ठी व स#मी को वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। उनकी आराधना के लिए शाम को अस्त और सुबह उदय होते सूर्य को अघ्र्य देकर कामना की जाती है। यह भी कहा जाता है कि राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी को कोई संतान नहीं थी। इससे राजा व्यथित होकर खुदकुशी करने जा रहा था। तभी षष्ठी देवी प्रकट हुई। उन्होेंने राजा से संतान सुख के लिए षष्ठी देवी की पूजा करने के लिए कहा। राजा ने देवी की आज्ञा मानकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को षष्ठी देवी की पूजा थी। प्रियव्रत को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तब से छठ व्रत का अनुष्ठान चला आ रहा है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम 14 साल का वनवास खत्म होने पर अयोध्या लौट आए।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देवता की पूजा की। तब से जनमानस में ये पर्व मान्य हो गया।

Wednesday, 22 October 2014

सबके जीवन में खुशहाली लाए दिवाली



संस्कार की रंगोली सजे,
विश्वास के दीप जले,
आस्था की पूजा हो,
सद्भाव की सज्जा हो,
स्नेह की धानी हो,
प्रसन्नता के पटाखे,
प्रेम की फुलझड़ियां जलें,
आशाओं के अनार चलें,
ज्ञान का वंदनवार हो,
विनय से दहलीज सजे,
सौभाग्य के द्वार खुले,
उल्लास से आंगन खिले,
दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधिसे बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति। भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं।ख्1, माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चैदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।ख्2, अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दीवाली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ सुथरा का सजाते हैं। बाजारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाजार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नजर आते हैं।
दीपावली पर लक्ष्मीजी का पूजन घरों में ही नहीं, दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में भी किया जाता है। कर्मचारियों को पूजन के बाद मिठाई, बर्तन और रुपये आदि भी दिए जाते हैं। दीपावली पर कहीं-कहीं जुआ भी खेला जाता है। इसका प्रधान लक्ष्य वर्ष भर के भाग्य की परीक्षा करना है।

ठसवबाुनवजम-वचमद.हप िइस दिन धन के देवता कुबेरजी, विघ्नविनाशक गणेशजी, राज्य सुख के दाता इन्द्रदेव, समस्त मनोरथों को पूरा करने वाले विष्णु भगवान तथा बुद्धि की दाता सरस्वती जी की भी लक्ष्मी के साथ पूजा करें।
इस प्रथा के साथ भगवान शंकर तथा पार्वती के जुआ खेलने के प्रसंग को भी जोड़ा जाता है, जिसमें भगवान शंकर पराजित हो गए थे। जहां तक धार्मिक दृष्टि का प्रश्न है, आज पूरे दिन व्रत रखना चाहिए और मध्यरात्रि में लक्ष्मी-पूजन के बाद ही भोजन करना चाहिए। जहां तक व्यवहारिकता का प्रश्न है, तीन देवी-देवों महालक्ष्मी, गणेशजी और सरस्वतीजी के संयुक्त पूजन के बावजूद इस पूजा में त्योहार का उल्लास ही अधिक रहता है। इस दिन प्रदोष काल में पूजन करके जो स्त्री-पुरुष भोजन करते हैं, उनके नेत्र वर्ष भर निर्मल रहते हैं। इसी रात को ऐन्द्रजालिक तथा अन्य तंत्र-मन्त्र वेत्ता श्मशान में मन्त्रों को जगाकर सुदृढ़ करते हैं। कार्तिक मास की अमावस्या के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर की तरंग पर सुख से सोते हैं और लक्ष्मी जी भी दैत्य भय से विमुख होकर कमल के उदर में सुख से सोती हैं। इसलिए मनुष्यों को सुख प्राप्ति का उत्सव विधिपूर्वक करना चाहिएं।
लक्ष्मी जी के पूजन के लिए घर की साफ-सफाई करके दीवार को गेरू से पोतकर लक्ष्मी जी का चित्र बनाया जाता है। लक्ष्मीजी का चित्र भी लगाया जा सकता है।
संध्या के समय भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, केला, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ होनी चाहिए। लक्ष्मी जी के चित्र के सामने एक चैकी रखकर उस पर मौली बांधनी चाहिए।
इस पर गणेश जी की व लक्ष्मी जी की मिट्टी या चांदी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए तथा उन्हें तिलक करना चाहिए। चैकी पर छरू चैमुखे व 26 छोटे दीपक रखने चाहिए और तेल-बत्ती डालकर जलाना चाहिए। फिर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करना चाहिए।
पूजा पहले पुरुष करें, बाद में स्त्रियां। पूजन करने के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। एक छोटा तथा एक चैमुखा दीपक रखकर लक्ष्मीजी का पूजन करें।
इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें।
अपने व्यापार के स्थान पर बहीखातों की पूजा करें। इसके बाद जितनी श्रद्धा हो घर की बहू-बेटियों को रुपये दें।
लक्ष्मी पूजन रात के समय बारह बजे करना चाहिए।
दुकान की गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
रात को बारह बजे दीपावली पूजन के बाद चूने या गेरू में रूई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल-बट्टा तथा सूप पर तिलक करना चाहिए।
रात्रि की ब्रह्मबेला अर्थात प्रातरूकाल चार बजे उठकर स्त्रियां पुराने सूप में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाती हैं तथा सूप पीटकर दरिद्रता भगाती हैं।
सूप पीटने का तात्पर्य है- श्आज से लक्ष्मीजी का वास हो गया। दुख दरिद्रता का सर्वनाश हो।श् फिर घर आकर स्त्रियां कहती हैं- इस घर से दरिद्र चला गया है। हे लक्ष्मी जी! आप निर्भय होकर यहाँ निवास करिए।