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Monday, 30 December 2013

भारतवासियों को नए वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें - पूर्वांचल विकास मोर्चा


सभी भारतवासियों को आने वाले नए साल कि शुभकामनाओं के साथ मैं उकना ध्यान बीते वर्ष कि कुछ विशेष घटनाओं पर ले जाना चाहता हूँ। २०१३ काफी उथल पुथल भरा साल रहा है।  जहाँ एक तरफ कांग्रेस को ४ राज्यों के विधानसभा चुनावों में करारी शिकश्त मिली और उसका सूपड़ा साफ़ हो गया वही दूसरी ओर आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अप्रत्याशित सफलता मिली। यह साल भाजपा के लिए भी काफी अच्छा रहा और उन्हें चुनावों मैं भरी सफलता मिली।  जहाँ कांग्रेस को अपने कुशाशन और भ्रस्टाचार कि वजह से नुकसान उठाना पड़ा वहीँ भाजपा ने मोदी को आगे करके और गुजरात मॉडल को जनता के सामने रख कर जनता का विश्वास जीता।
इस साल के शरुआत मैं ही चीन ने लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन भारत सरकार नपुंसक कि तरह टालमटोल करती रही , यही नहीं पाकिस्तान ने जब हमारे दो सैनिकों कि हत्या कर दी और एक का तो सर ही काट ले गए तो भी सरकार को शर्म नहीं आयी और आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है।  यह कांग्रेस कि कमजोर विदेश और रक्षा नीतियों का ही परिणाम है।  महगाईं से पूरे साल जनता तस्त्र रही है और अभी भी कम होने का नाम नहीं ले रही हालत यह कि प्याज के दाम १०० रुपये किलो तक पहुँच गए और आम जनता के लिए तो एक वक्त कि रोटी भी कहानी मुश्किल हो गया है और ऊपर से कांग्रेसी नेता जले पर नमक छिड़कते हुए कहते हैं कि १२ रुपये मैं थाली मिल जाती है उस पर एक और कदम आगे बढ़ते हुए मोंटेक सिंह अहवालिआ तो यहाँ तक कह देते हैं कि दिन २५ रुपये खर्च करने वाला आदमी गरीब नहीं है।
यह सब बाते कोग्रेस का असली चेहरा ही उजागर करती है। क्यों कि जबसे ये सत्ता मैं आये हैं तबसे देश का बंटाधार कर रहे हैं और जब इन्हे मोदी से चुनौती मिली तो सभी के सभी बौखला गए और आये दिन राहुल गांधी से मोदी कि तुलना करने लगे है।  अब जब कि देश के सामने इनकी पोल खुल गयी है और ये साबित हो गया है कि राष्ट्रीय और अनतराष्ट्रीय हर मोर्चे पर विफल हो चुकी सोनिया और टीम का गुजरात को विश्व के मानचित्र पर लेन वाले मोदी से कोई तुलना नहीं तो लोग लोक सभा चुनावों में  मोदी को चुनेंगे ऐसा में आशा है। आने वाला साल सबके लिए मंगलमय हो।   जय हिन्द जय भारत

अजित कुमार पाण्डेय ( अध्यक्ष ) पूर्वांचल विकास मोर्चा

पूर्वांचल विकास मोर्चा की तरफ से आप सभी को नए साल की हार्दिक बधाई

नव वर्ष के आगमन पर हार्दिक बधाई।
नव वर्ष शुभ हो।
नव वर्ष आपके जीवन मे उमग लाये।
नया साल आपको नया अनुभव दे।
नव वर्ष आपके लिये हितकारी हो।
नव वर्ष मे हर कदम पर आपको सफलता मिले।
नव वर्ष मे आप फले, फूले।
नया साल आपके लिये लाभदायक हो।
नया साल आपके लिये नयी खुशिया लाये।
नया साल आपको नया उत्साह प्रदान करे।
नव वर्ष सुख- सम्रध्धि से भरपूर हो।
नव वर्ष मे आपकी सभी मनोकामनाये पूरी हो।
नव वर्ष मे भाग्य सदैव आपका साथ दे।
नव वर्ष मे आपकी दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की हो।
**** अजित कुमार पाण्डेय ( अध्यक्ष ) पूर्वांचल विकास मोर्चा  की तरफ से आप सभी को नए साल की हार्दिक बधाई

Friday, 27 December 2013

केजरीवाल जी को दिल्ली के ७वे मुख्यमंत्री बनने कि हार्दिक बधाई



केजरीवाल कांग्रेस के साथमिल कर सरकार तो बनाने में कामयाब हो गए लेकिन ये सरकार चलती कितनी दिन है ये देखना दिलचस्प होगा। केजरीवाल चुनावों के पहले और बाद भी यही राग अलापरहे थे कि वो न भाजपा न ही कांग्रेस को समर्थन देंगे न ही उनसे समर्थन लेंगे।  लेकिन भाजपा के सरकार बनाने से मन कर देने के बाद उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया और जिस पार्टी के खिलाफ ही उनका पूरा आंदोलन था और जिन मुद्दों पर उन्हें चुनावों मैं सफलता हाथ लगी उन सब बातों को भूल कर उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया जो यही जाहिर करता है कि केजरीवाल भी सत्ता के भूखे हैं और ईमानदारी के ढोंग करते हैं।  हलाकि उन्होंने और उनके पार्टी के अन्य लोगो ने जनता कि आँखों मैं खूब धुल झोकी और अंत तक कांग्रेस से हाथ न मिलाने कि बात करते रहे और कुमार विश्वास ने तो कांग्रेस को दो मुह साप तक कह डाला लेकिन आखिर में उसी दो मुहे साप को गले लगा लिया।  केजरीवाल ने किसी तरह जोड़ तोड़ के सरकार तो बना ली लेकिन अपनी बैटन से वो अभी ही मुकरने लग गए हैं।  पहले तो वो सरकार बनने के दस दिनों के अंदर ही बिजली के दाम घटाने कि और मुफ्त पानी देने कि बात कर रहे थे लेकिन अब वो इन बातो से बचने कि कोशिश कर रहे हैं और ऑडिट का हवाला दे रहे हैं कि कम से कम तीन महीने तो बिजली कम्पनियों का ऑडिट करने मैं लग जायेगा।  क्या उनको यह बात पहले नहीं पता थी या अभी पता लगी , निश्चित है कि उन्होंने सिर्फ चुनाव जीतने के लिए इन सब वादों का उपयोग किया, वैसे भी वो वादों से पलटना काफी अच्छे से जानते हैं।  अन्ना के साथ आंदोलन करते समय भी वो यही राग अलाप रहे थे कि उनका आंदोलन गैर राजनितिक होगा ,लेकिन आंदोलन कि सफलता देख उनकी नीयत बदल गयी और उन्होंने पहले तो अन्ना का आंदोलन हाइजैक किया फिर पार्टी भी बना ली।  अभी सरकार पूरी तरह से बनी भी नहीं है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लोगो के बीच वाक्युद्ध शुरू हो गया है , कोई किसी को दोमुहा साप और चोर बता रहा है तो कोई भाषा कि गरिमा सिखा रहा है।  जो भी हो कोग्रेस के समर्थन देने के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए और आम आदमी पार्टी के बदलते हुए सुरों को देखते हुए इस सरकार का ज्यादा दिन चल पाना मुश्किल लगता है।

अजित कुमार पाण्डेय ( अध्यक्ष ) पूर्वांचल विकास मोर्चा 

Wednesday, 25 December 2013

युगपुरूष अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामना







पूर्वांचल विकास मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत कुमार पाण्डेय ने कहा कि अपनी पांच दशक लंबी राजनीतिक पारी में  भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  ने विपक्ष के सशक्त स्वर से लेकर देश के प्रधानमंत्री के पद तक का गौरवमयी सफर तय किया. वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के शासनकाल को कई विशेषज्ञ आर्थिक वृद्धि तथा अवसंरचना निर्माण के लिहाज से सफलताओं भरा वर्ष मानते हैं. यदि भाजपा के पास अटलजी जैसा सर्वसमावेशी व्यक्तित्व नहीं होता, तो ऐसा गंठबंधन बनना मुश्किल हो जाता. यदि स्वार्थवश कुछ दल इकट्ठे हो जाते भी, तो उन्हें टूटने में ज्यादा समय नहीं लगता. यह अटलजी के व्यक्तित्व की खूबी ही थी कि शरद यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, फारूक जैसे लोग भी उनकी सरकार में सहर्ष काम करते रहे.इतिहास में व्यक्ति की अहम भूमिका होती है. अमेरिका में जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, सोवियत संघ में लेनिन. ऐसे सैकड़ों उदाहरण विद्यमान हैं. वाजपेयी को उन राजनेताओं में गिना जाना चाहिए, जिनका व्यक्तित्व उन्हें अलग पहचान देता रहा. राजनीति में विचारधारा एवं मूल्य के अतिरिक्त जो तीसरा सबसे महत्वपूर्ण आयाम होता है, वह है पात्रता. जो व्यक्ति अपने व्यवहार और सामाजिक सरोकारों में पारदर्शिता से जीवन जीता है, वह स्वाभाविक तरीके से जनप्रिय बन जाता है. सिर्फ विचारधारा और मूल्यों की बात करनेवाला व्यक्ति एक दायरे में सिमट कर रह जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी आधुनिक भारत की उन शख्सीयतों में से हैं, जिन्होंने राजनीति में रहने की अपनी सार्थकता को अपने विचार और व्यवहार दोनों से स्थापित किया.

वाजपेयी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जहां उनके अंदर वैचारिक प्रतिबद्धता कूट-कूट कर भरी रही, वहीं वह अन्य वैचारिक व सामाजिक ताकतों से निरंतर संवाद करते रहे. यह पक्ष वाजपेयी के संबंध में उल्लेखनीय इसलिए हो जाता है कि वे जिस दल व विचार से जुड़े रहे हैं, वह राजनीतिक छुआछूत का शिकार रहा है. आप कल्पना कीजिए 1950 के दशक की, जब जवाहरलाल नेहरू जैसे लोकप्रिय नेता ने बिना प्रमाण और सबूत के संघ को न सिर्फ प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी, बल्कि गांधी का हत्यारा भी घोषित कर दिया था. वाजपेयी इस मुकाम पर इस विचारधारा और दल के श्रेष्ठतम प्रवक्ता बन कर उभरे. उन्होंने अपनी राजनीतिक शैली में तीन मार्गो का अनुशरण किया. पहला, कठिन, दुरूह और विवादित विषयों को भी सहजता, सरलता और उदारता के साथ रखने का प्रयास करते रहे. व्यक्ति जब अपने मन, बुद्धि और हृदय से सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होता है, तो भाषा अपने आप सहायक के रूप में काम करती जाती है. इसलिए वाजपेयी को एक कुशल वक्ता से कहीं बड़ा और सफल संवादक मानना चाहिए.

भारत में बीते साढ़े छह दशक में दर्जनभर से ज्यादा प्रधानमंत्री हुए, लेकिन मेरी राय में अब तक सिर्फ चार प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं, जिन्हें देश लंबे वक्त तक याद करेगा. ये हैं-जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, पीवी नरसिंहराव व अटल बिहारी वाजपेयी! इन चारों प्रधानमंत्रियों ने अपनी पूर्ण अवधि तक राज किया और भारत के इतिहास-पटल पर ऐसी गहरी लकीरें खींचीं, जिनका प्रभाव कई दशकों तक बना रहेगा. श्रीमती इंदिरा गांधी से मेरा काफी संपर्क रहा. नरसिंहरावजी के साथ घनिष्ट सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिला और अटलजी के साथ छात्र-काल से बना आत्मीय व पारिवारिक संबंध उनके प्रधानमंत्री काल और बाद में भी बना रहा है. आज अटलजी के जन्मदिन पर कुछ ऐसी बातों की चर्चा, जिनके लिए वे याद किये जाएंगे.

सबसे पहली बात, जिसके लिए अटलजी को सदियों तक याद किया जाएगा, वह है पोखरन का परमाणु-विस्फोट! वह भारतीय संप्रभुता का शंखनाद था. दुनिया की परमाणु-शक्तियां 12 मई, 1998 को बहुत बौखलाईं. उन्होंने अनेक अप्रिय बयान और धमकियां भी जारी कीं, लेकिन यही वह दिन था, जबसे भारत की गणना शक्तिशाली राष्ट्रों में होने लगी. अटलजी ने इंदिराजी का अधूरा काम पूरा किया. यह काम राव साहब करें, यह सलाह मैंने उन्हें चुनाव के तीन-चार माह पहले दी थी. उन्होंने तैयारी भी कर ली थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण उन्होंने देर कर दी. वे सोच रहे थे कि दोबारा चुनकर आएंगे, तब करेंगे. अटलजी को जैसे ही मौका मिला, उन्होंने यह चमत्कारी कदम उठा लिया. यह विस्फोट शनिवार शाम को हुआ था. रविवार सुबह उनसे मेरी बात हुई. उसके पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से सुबह ही फोन पर मेरी बात हुई. वे लाहौर के अपने मॉडल टाउन वाले बंगलों में उस रात ही लौटे थे. मैंने अटलजी से कहा कि अगले हफ्ते-डेढ़ हफ्ते में ही पाकिस्तान भी परमाणु बम फोड़ेगा, वरना नवाज शरीफ को गद्दी छोड़ना पड़ेगी. अटलजी को विश्वास नहीं हुआ. फिर भी मैंने उनसे कहा कि आप मियां नवाज को फोन कीजिए और उनसे कहिये कि यह भारत का नहीं, तीसरी दुनिया का बम है. आपका भी है और हमारा भी है. इस पर भी पाकिस्तान विस्फोट कर ही दे, तो हमें एक द्विपक्षीय परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और विषद परमाणु-परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) के लिए तैयार करना चाहिए. पाकिस्तान ने कुछ दिनों बाद हमसे भी बड़ा विस्फोट कर दिया. भारत ने ‘हम पहल नहीं करेंगे’ यानी आगे होकर हम परमाणु हथियार नहीं चलाएंगे, ऐसी रचनात्मक घोषणा की. बाद में मैंने भारत-पाक द्विपक्षीय परमाणु संधि पर एक लेख लिखा, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने प्रधानमंत्री के कहने पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार समिति के सभी सदस्यों को भिजवाया. कहने का तात्पर्य यह कि अटलजी अपने से छोटों की बात पर भी ध्यान देनेवाले नेता थे.

अटलजी का दूसरा उल्लेखनीय काम था करीब दो दर्जन दलों की गठबंधन सरकार को पूरे पांच साल तक चला ले जाना. देश का कोई अन्य नेता ऐसा चमत्कार नहीं कर सका. उनके गठबंधन में फारूक अब्दुल्ला की कश्मीरी पार्टी से लेकर जयललिता और एस रामदास की तमिल पार्टियां भी थीं. उन्होंने भाजपा को सचमुच एक राष्ट्रीय पार्टी बना दिया. यदि भाजपा के पास अटलजी जैसा सर्वसमावेशी व्यक्तित्व नहीं होता, तो ऐसा गठबंधन बनना मुश्किल हो जाता. यदि स्वार्थवश कुछ दल इकट्ठे हो जाते भी, तो उन्हें टूटने में ज्यादा समय नहीं लगता. यह अटलजी के व्यक्तित्व की खूबी ही थी कि शरद यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, फारूक जैसे लोग भी उनकी सरकार में सहर्ष काम करते रहे. उन्होंने जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे राजनीति के बाहर से आये लोगों से भी काम लिया. विभिन्न क्षेत्रीय दलों की तरफ से आनेवाले दबावों को वे गद्दीदार कागज की तरह से सोखते रहते थे. उन्होंने भाजपा जैसी विचारधारा में आबद्ध पार्टी को नरम किया और कश्मीर, राममंदिर तथा समान आचार संहिता जैसे विवाद वाले मुद्दों को हाशिये पर डाल दिया. एक अर्थ में उन्होंने अपनी सरकार को शक्तियों के ऐसे विराट गंठबंधन में परिवर्तित कर दिया, जिनसे मिल कर कभी नेहरू की कांग्रेस बनी थी. परमाणु-बम के मामले में उन्होंने इंदिराजी के काम को आगे बढ़ाया, तो विविध शक्ति-समन्वय के मामले में नेहरूजी के काम को नया आयाम दिया. अटलजी ने अपने चातुर्य से यह महत्वपूर्ण बात रेखांकित की कि यदि भारत को भारत की तरह चलाना है तो अपनी पार्टी और सरकार को सर्वसमावेशी बना कर चलाना होगा. वे शासन के संचालन में अपनी विरोधी कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं के अनुभवों से लाभ उठाने में भी संकोच नहीं करते थे. उनका स्वभाव इतना अच्छा था कि यदि देश में कोई सर्वदलीय सरकार भी बनती तो मुङो लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी उन्हें दिल से नेता स्वीकार कर लेतीं, चाहे प्रकट तौर पर वे विरोध ही करतीं. इस दृष्टि से अटलजी भावी पीढ़ियों के नेताओं के लिए अनुकरणीय बन गये हैं. इसीलिए मैंने पिछले दिनों एक लेख में लिखा था कि जब तक नरेंद्र मोदी के शरीर में अटलजी की ‘आत्मा’ का प्रवेश नहीं होगा, उनका प्रधानमंत्री बनना और बन कर टिके रहना मुश्किल होगा.

अटलजी के कार्यकाल में कई ऐसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू हुए, जो रचनात्मकता और नवीनता के लिए जाने जाएंगे. जैसे सड़कों से पूरे देश को जोड़ना. नदियों को भी एक-दूसरे से जोड़ने की योजना उन्होंने बनायी थी. सरकार की कई बीमारू संस्थाओं को उन्होंने गैर-सरकारी बना दिया. यह थोड़े साहस का काम था. उन्होंने नरसिंहराव सरकार की कई पहलों को अंजाम दिया. अर्थव्यवस्था में भी नयी चमक पैदा हुई. महंगाई पर नियंत्रण हुआ. लोगों की आमदनी बढ़ी. करगिल-युद्ध में भी भारत की जीत हुई. सरकार ने संयम से काम लिया. भारत ने पाकिस्तानियों को अपने क्षेत्र से बाहर खदेड़ा, लेकिन उनके क्षेत्र पर कब्जा नहीं किया. सारी दुनिया में भारत की सराहना और पाकिस्तान की निंदा हुई.

उस जमाने में विदेश नीति के क्षेत्र में भी अटलजी ने कुछ ऐसे कदम उठाये, जिनका प्रभाव हमें भावी दशकों में बराबर देखने को मिलेगा. उन्हें यह श्रेय मिलेगा कि उन्होंने अफगानिस्तान को भू-राजनीतिक आजादी दिलायी. मैं इंदिराजी और अफगान राष्ट्रपति सरदार दाऊद खान से 1973 से आग्रह कर रहा था कि वे पाकिस्तान की घेराबंदी खत्म करें. अफगानिस्तान आने-जाने के लगभग सभी प्रमुख मार्ग पाकिस्तान होकर निकलते हैं. पाकिस्तान जब चाहता है, अफगानिस्तान का हुक्का-पानी बंद कर देता है. इससे भारत और अफगानिस्तान के संबंधों में सबसे बड़ी बाधा उपस्थित हो जाती है. अटलजी ने अफगानिस्तान से ईरान की सीमा तक एक पक्की सड़क बनवा दी. यह जरंज-दिलाराम मार्ग ऐसा विकल्प है, जो ईरान की खाड़ी के जरिये अफगानिस्तान को पूरे दक्षिण एशिया से जोड़ देगा. हामिद करजई की सरकार को अन्य क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग देने और अफगानिस्तान को दक्षेस का सदस्य बनवाने में भी अटलजी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है.

अटलजी ने चाहे करगिल में पाकिस्तान को सबक सिखाया, लेकिन बाद में उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ की सरकार से अच्छे संबंध बनाने की भरसक कोशिश की. उन्हीं का कूटनीतिक कौशल था कि पाक सरकार ने 2004 में कहा कि वे भारत के विरुद्ध अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादियों को नहीं करने देंगे. संसद पर हमला होने के बाद भारत ने सीमांत पर जो शक्ति-प्रदर्शन किया, उसने पाकिस्तान के होश ढीले कर दिये थे. कश्मीर पर मुशर्रफ का रवैया काफी बदल गया था. दोनों कश्मीरों के बीच आवाजाही शुरू हो गयी थी. वीजा के प्रतिबंध कुछ ढीले पड़े थे. लोगों के संबंध आपस में बढ़ने लगे थे. यदि अटलजी एक बार और प्रधानमंत्री रह जाते तो भारत-पाक संबंध शायद हमेशा के लिए सुधर जाते, क्योंकि उन दिनों कई बार मुङो पाकिस्तान जाने का मौका मिला और वहां मैंने पाया कि अटलजी से ज्यादा लोकप्रिय कोई भी अन्य भारतीय नेता नहीं हुआ. यहां तक कि जमाते-इसलामी के नेता भी अटलजी के बारे में संभलकर बोलते थे.

श्रीलंका, नेपाल, बर्मा आदि के बारे में अटलजी ने कई पहल कीं, लेकिन अमेरिका के साथ भारत के संबंधों को सहज पटरी पर लाने का मुख्य श्रेय उन्हीं को है. वे चीन के साथ भी सहज संबंध बनाने को उत्सुक थे. जब वे विदेश मंत्री थे, मोरारजी देसाई की सरकार में, तब भी उन्होंने विशेष प्रयास किया था. संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि उनकी विदेश नीति में भी उनके व्यक्तित्व की गरिमा और उदारता सदा प्रतिबिंबित होती रही. यह होते हुए भी भारत के राष्ट्रहित की कभी उपेक्षा नहीं हुई.
अटलजी की संवेदना और करुणा का सर्वोत्तम उदाहरण तब देखने को मिला, जब 2002 में गुजरात में नरसंहार हुआ. जिस दिन गोधरा में वह दुर्घटना हुई, अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई भारत आये हुए थे. हैदराबाद हाउस में राजभोज था. दोपहर लगभग साढ़े तीन बजे हमलोग जब बाहर निकले तब पता चला कि गोधरा में कई लोगों को जिंदा जला दिया गया. उसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई. अटलजी से बराबर बातचीत होती रहती थी. कुछ दिन बादे नवभारत टाइम्स में मेरा लेख छपा, जिसमें मैंने लिखा, ‘गुजरात में राजधर्म का उल्लंघन हो रहा है.’ लेख पढ़ते ही अटलजी ने मुङो फोन किया और जैसा कि उनका स्वभाव है, उन्होंने अतिशय प्रशंसा की. उन्होंने ‘राजधर्म’ के उल्लंघन की बात को कई बार दोहराया और वह आज भी एक मुहावरे की तरह दोहराया जाता है. गुजरात के बारे में अटलजी और मेरे बीच काफी विचार-विमर्श हुआ. बाद में स्वयं गुजरात जाकर अटलजी ने शरणार्थियों के शिविर में भाव-विह्वल होकर जैसे आंसू बहाये, वैसे तो कोई कवि-हृदय ही बहा सकता है. यह आम राजनेताओं या प्रधानमंत्रियों के बस की बात नहीं है.

Tuesday, 24 December 2013

युगपुरुष अटल जी को जन्मदिन कि हार्दिक शुभकामनाये - पूर्वांचल विकास मोर्चा



आज पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी के जन्मदिन पर उनको पूर्वांचल विकास मोर्चा कि तरफ से हार्दिक  बधाई।  २५ दिसम्बर १९२५ को एक साधारण परिवार मैं जन्मे अटल जी भारत के १० वे प्रधानमंत्री बने।  इसके अलावा भी वे विभिन्न सरकारों में कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। अटल जी एक प्रखर वक्ता होने के साथ अपनी ख़ास शैली कि कविताओं के लिए भी जाने जाते हैं।  भारत के प्रधानमन्त्री रहते हुए उन्होंने भारत को विश्व के मानचित्र  पर एक विशेष स्थान दिलाया।  भारत के इस महानसपूत को जन्मदिन पर विशेष बधाई तथा अच्छे स्वास्थ्य कि कामना। अजित कुमार पाण्डेय ( अध्यक्ष ) पूर्वांचल विकास मोर्चा 

Monday, 23 December 2013

हिंदुस्तानी राजनीति के आखिरी करिश्माई राजनेता हैं अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी यानि एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती। एक साधारण परिवार में जन्में इस राजनेता ने अपनी भाषण कला, भुवनमोहिनी मुस्कान, लेखन और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति में दुर्लभ है। सही मायने में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के सबसे करिश्माई नेता और प्रधानमंत्री साबित हुए।

एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक में परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसीलिए राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद उनके पीछे एक ऐसा परिवार था जिसका नाम संघ परिवार है।

जहां अटलजी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने, जिसने उनमें इस देश का नायक बनने की क्षमताएं न सिर्फ महसूस की वरन अपने उस सपने को सच किया, जिसमें देश का नेतृत्व करने की भावना थी। अटलजी के रूप में इस परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में हिंदू संस्कृति का प्रणेता और पोषक बना।
.अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे।भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पार कर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया।


 उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया।

मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न तो उनके जीवन में है न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते हैं।

पने समूचे जीवन से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता साकेत में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा।

 स्वतंत्र भारत के इस आखिरी करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। शायद इसीलिए उनको चाहनेवाले उनकी लंबी आयु की दुआ करते हैं और यह पंक्तियां गाते हुए आगे बढ़ते हैं ‘चल रहे हैं चरण अगणित, ध्येय के पथ पर निरंतर’।

Friday, 13 December 2013

शरद पवार ने पूर्वांचलियों के साथ किया धोखा - अजित पाण्डेय ( अध्यक्ष - पूर्वांचल विकास मोर्चा )



आज में यह ब्लॉग मुख्य रूप से पूर्वांचलवासियों से जुडी समस्याओं और और उनकी अनदेखी के ऊपर लिख रहा हूँ।  आजादी के बाद से ही लगातार इस क्षेत्र कि अनदेखी कांग्रेस द्वारा कि जाती रही है।  परिणाम स्वरुप यह क्षेत्र पिछड़ता चला गया।  जिस प्रकार सरकार ने अन्य क्षेत्रों में विकास किया और  इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया और शिक्षा, कृषि, भूमि विकास, स्वास्थय आदि अन्य क्षेत्रों में काम किया जिसके परिणाम स्वरुप यह क्षेत्र तो विकसित हो गए लेकिन लगातार अनदेखी कि वजह से पूर्वांचल कि हालत बद से बदतर हो गयी है। लगातार अनदेखी का आलम ये है कि इस क्षेत्र में विकास का कोई नामोनिशान तक नहीं मिलता तथा रोज़गार, कृषि , शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों कि हालत पतली है।  इसकी  वजह से तमाम युवक रोज़गार कि तलाश में अन्य प्रदेशों में पलायन को मजबूर हैं।
इसकी वजह से कुछ ख़ास शहरों में आबादी भी बढ़ती जा रही है और लोग कीड़े मकोड़ो कि तरह झुग्गियों मैं रहनो को मजबूर हैं।  आखिर इतना बड़ा क्षेत्र  होने के बावजूद और तमाम राष्ट्रीय स्तर के  नेता देने के बावजूद भी पूर्वांचल का विकास क्यों नहीं हो पाया ? इसका एक कारण यहाँ का जातीय समीकरण भी है।  कांग्रेस ने आज़दी के बाद से ही लगातार इस में जातीय आधार पर लोगो को बाटने कि साजिश रची जिसमें उसे बसपा , सपा , जदयू का भी खूब साथ मिला।  इन सभी अपने अपने फायदे के लिए इस क्षेत्र का खूब बटवारा किया और यहाँ के लोगो शोषण किया।  गौर फरमाने वाली बात यह है कि आखिर इस क्षेत्र मुलभुत सुविधावों कि कमी इस लिए कि गयी ताकि पूर्वांचली अन्य लोगो से कटे रहे हैं और विकास कि लहर के कारन उनमे एकजुटता न जाये जिसके परिणाम स्वरुप वे  इन लोगो कि गन्दी चालों को समझ जाएँ और इनका वोट बैंक न ख़त्म हो जाये।  इसका उदहारण हमे अन्य पिछड़े क्षेत्रों के अध्ययन से मिल सकता है , जैसे कि पूर्वोत्तर राज्य और जम्मू और कश्मीर। इन सभी जगहों पर कांग्रेस ने स्थानीय दलों के साथ मिल कर जातीय विभाजन किया और धार्मिक उन्नमाद को बढ़ावा दिया।  अभी हाल ही मैं शरद पवार द्वारा पूर्वांचल के लोगो और किसानो के साथ किया गया भेदभाव भी इसी कि कड़ी है। पूर्वांचल के विकास के लिए जरुरी है कि इन्हे एकजुट किया जाये और एक शशक्त आवाज दी जाये और यह काम सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के द्वारा ही सम्भव है क्योंकि मुख्य राष्ट्रीय पार्टी होने और अगले लोक सभा चुनावों मैं पक्की जीत जीत मिलने के कारण  पूर्वांचलियों को एकजुट होना होगा उर भारतीय जनता पार्टी को जितना होगा, ताकि इस क्षेत्र का विकास सम्भव होसके।

अजित कुमार पाण्डेय
अध्यक्ष , पूर्वांचल विकास मोर्चा