Translate

Monday, 12 August 2013

चिदंबरम कुरियन के बीच तकरार





एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में आज राज्यसभा में प्रक्रिया को लेकर वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उपसभापति पीजे कुरियन के बीच तकरार हो गई जिसके चलते सदन की कार्यवाही करीब एक घंटे तक बाधित रही। यह तकरार तब शुरू हुई जब कुरियन ने सदन में विपक्ष के नेता अरूण जेटली को जम्मू कश्मीर के हिंसा प्रभावित किश्तवाड़ इलाके की स्थिति पर अपनी बात रखने के लिए कहा। इससे पहले भाजपा सदस्यों ने जोरदार मांग की थी कि इस मुद्दे पर जेटली को बोलने दिया जाए क्योंकि रविवार को उन्हें किश्तवाड़ जाने की अनुमति नहीं दी गई थी।

इस बीच, चिदंबरम ने कहा कि वह इस मुद्दे पर बयान देना चाहते हैं और उन्हें पहले अनुमति दी जानी चाहिए। कुरियन ने कहा कि चूंकि वह पहले ही जेटली को अपनी बात रखने की अनुमति दे चुके हैं लिहाजा वित्त मंत्री जेटली के बाद बयान दे सकते हैं। उन्होंने चिदंबरम से कहा कि अगर उन्हें बयान देना था तो उन्हें इसकी सूचना पहले देनी चाहिए थी। इस पर चिदंबरम ने नाराजगी जताते हुए कहा ‘यह बिल्कुल नयी प्रक्रिया है। मैं सम्मानजनक तरीके से इस पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहता हूं।’ कांग्रेस के अहमद पटेल, अंबिका सोनी और सत्यव्रत चतुर्वेदी ने चिदंबरम की बात का समर्थन करते हुए आसन से कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर बयान देने की अनुमति पहले दी जानी चाहिए।

बहरहाल, कुरियन अपनी बात पर कायम रहे और कहा, ‘मैं जब यहां आया तो मैंने विपक्ष के नेता को बोलने की अनुमति दी। मुझे सरकार की ओर से कोई सूचना नहीं मिली थी। आपको पहले सूचित करना चाहिए था। मैंने विपक्ष के नेता को अपनी बात रखने की अनुमति दे दी है।’ दूसरी ओर चिदंबरम आसन के फैसले पर लगातार अपना विरोध जताते रहे। भाजपा सदस्यों ने आसन के फैसले पर सत्तारूढ़ दल की आपत्तियों को लेकर विरोध जताया। इस पर हंगामा शुरू हो गया जिसके कारण कुरियन ने दोपहर 12 बज कर करीब दस मिनट पर बैठक आधे घंटे के लिए स्थगित कर दी।

Saturday, 10 August 2013

रॉबर्ट वाड्रा की फर्जी डील !





हरियाणा के गांव में राबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खोमका ने आरोप लगाया है कि वाड्रा ने गुड़गांव में 3.53 एकड़ जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कालोनी के लाइसेंस पर बड़ा मुनाफा हासिल किया। वाड्रा-डीएलएफ सौदे की जांच के संदर्भ में पिछले वर्ष अक्तूबर में हरियाणा सरकार की ओर से गठित की गई तीन सदस्यीय जांच समिति के समक्ष विस्तृत जवाब पेश किया। समझा जाता है कि खेमका ने वाड्रा पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 एकड़ जमीन के लिए फर्जी लेनदेन किया।
हरियाणा के चर्चित आईएएस अशोक खेमका ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीन के सौदे के मामले में अपनी रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने गुड़गांव में गलत दस्तावेजों के जरिए जमीन का सौदा किया। मामला गुड़गांव के शिकोहपुर में साढ़े तीन एकड़ जमीन का है। ये वही जमीन है जिसके सौदे की जांच करने के बाद आईएएस खेमका ने जमीन की रजिस्ट्री को ही रद्द कर दिया था।
इस मामले में खेमका ने 21 मई को ही 100 पन्नों की रिपोर्ट हरियाणा सरकार की बनाई 3 सदस्यीय जांच कमेटी को सौंपी है। आपको बता दें कि वाड्रा और डीएलएफ के बीच डील में हुई कथित धांधली के आरोप लगने के बाद हरियाणा सरकार ने अक्टूबर 2012 में जांच कमेटी गठित की थी।
यूं तो रॉबर्ट वाड्रा उस समय से ही चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गाँधी से शादी की थी। रॉबर्ट वाड्रा का दरअसल हैंडीक्राफ्ट आइटम्स और कस्टम आभूषणों का कारोबार है और उनकी कंपनी का नाम है आर्टेक्स एक्सपोर्ट्स. इसके अलावा भी रॉबर्ट वाड्रा की कई कंपनियों में भागीदारी है। रॉबर्ट वाड्रा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए। उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और माँ स्कॉटलैंड की रहने वाली है। रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी।
बाद में दोनों की नज़दीकियां बढ़ीं और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाया कि एक बड़े रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ़ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियां कौड़ियों के दामों में दे दीं। इसके अलावा इस बात का भी खुलासा हुआ की वाड्रा ने हरियाणा में कई संपत्तियां खरीदीं जिसमें नियमों की अनदेखी की गई। रॉबर्ट वाड्रा मोटर साइकिलों और कारों के भी शौकीन हैं। कहा जाता है कि वाड्रा के पास कई शानदार विदेशी कारों के अलावा मोटर साइकिलें भी हैं।

रॉबर्ट वाड्रा की फर्जी डील !





हरियाणा के गांव में राबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खोमका ने आरोप लगाया है कि वाड्रा ने गुड़गांव में 3.53 एकड़ जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कालोनी के लाइसेंस पर बड़ा मुनाफा हासिल किया। वाड्रा-डीएलएफ सौदे की जांच के संदर्भ में पिछले वर्ष अक्तूबर में हरियाणा सरकार की ओर से गठित की गई तीन सदस्यीय जांच समिति के समक्ष विस्तृत जवाब पेश किया। समझा जाता है कि खेमका ने वाड्रा पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 एकड़ जमीन के लिए फर्जी लेनदेन किया।
हरियाणा के चर्चित आईएएस अशोक खेमका ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीन के सौदे के मामले में अपनी रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने गुड़गांव में गलत दस्तावेजों के जरिए जमीन का सौदा किया। मामला गुड़गांव के शिकोहपुर में साढ़े तीन एकड़ जमीन का है। ये वही जमीन है जिसके सौदे की जांच करने के बाद आईएएस खेमका ने जमीन की रजिस्ट्री को ही रद्द कर दिया था।
इस मामले में खेमका ने 21 मई को ही 100 पन्नों की रिपोर्ट हरियाणा सरकार की बनाई 3 सदस्यीय जांच कमेटी को सौंपी है। आपको बता दें कि वाड्रा और डीएलएफ के बीच डील में हुई कथित धांधली के आरोप लगने के बाद हरियाणा सरकार ने अक्टूबर 2012 में जांच कमेटी गठित की थी।
यूं तो रॉबर्ट वाड्रा उस समय से ही चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गाँधी से शादी की थी। रॉबर्ट वाड्रा का दरअसल हैंडीक्राफ्ट आइटम्स और कस्टम आभूषणों का कारोबार है और उनकी कंपनी का नाम है आर्टेक्स एक्सपोर्ट्स. इसके अलावा भी रॉबर्ट वाड्रा की कई कंपनियों में भागीदारी है। रॉबर्ट वाड्रा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए। उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और माँ स्कॉटलैंड की रहने वाली है। रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी।
बाद में दोनों की नज़दीकियां बढ़ीं और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाया कि एक बड़े रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ़ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियां कौड़ियों के दामों में दे दीं। इसके अलावा इस बात का भी खुलासा हुआ की वाड्रा ने हरियाणा में कई संपत्तियां खरीदीं जिसमें नियमों की अनदेखी की गई। रॉबर्ट वाड्रा मोटर साइकिलों और कारों के भी शौकीन हैं। कहा जाता है कि वाड्रा के पास कई शानदार विदेशी कारों के अलावा मोटर साइकिलें भी हैं।

Friday, 9 August 2013

‘समाजवाद’ का गंदा सियासी चेहरा!

साल 2014 के आम चुनाव को नजदीक आते देख देश में एक बार फिर से वोटों के सौदागरों के बीच जंग तेज होती जा रही है। एक तरफ बहुसंख्यक समाज के हितों की दुहाई देने वाली पार्टी है तो दूसरी तरफ उसके मुकाबले तमाम ऐसी छोटी-बड़ी जमातें, जो परिवारवाद और जातिवाद की नींव पर खड़ी हैं और छद्म धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए सामाजिक ताने-बाने और गंगा-जमुनी तहज़ीब को तार-तार करने पर उतारु हैं।

ताज़ा मामला दुर्गा शक्ति नागपाल का है, जिसे उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार ने एक संप्रदाय विशेष के कथित पूजा स्थल की दीवार को गिरवाने का आरोप लगाकर निलंबित कर दिया है। देश के राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या कोई व्यक्ति, अगर संविधान और कानून की परवाह किए बगैर वोट की राजनीति करता है, तो उसे एक बार माफ किया जा सकता है, लेकिन जब संविधान की शपथ लेकर सत्ता में आई पार्टी ही, संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए वोट बैंक बढ़ाने में जुट जाए तो फिर देश का क्या होगा और क्या इस तरह के कामों में जुटी सरकार या शासन को कानून का शासन कहा जा सकता है?

देश की मौजूदा नौजवान पीढ़ी और लगभग सभी गैर समाजवादी पार्टी, राजनैतिक दल दुर्गा नागपाल के साथ खड़े हैं। सरकार को शायद The Place Of Worship (Special provisions) act 1991 और 2009 में Union of India versus State of Gujarat and Others मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पारित आदेश की भी संभवत: पूरी जानकारी नहीं है। अगर ऐसा होता तो एक संप्रदाय विशेष के वोट के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार एक कर्मठ प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई नहीं करती।

दुर्गा शक्ति नागपाल को उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव की ग्राम सभा की ज़मीन पर अवैध तरीके से बन रही मस्जिद की दीवार गिराने के तथाकथित आदेश की सज़ा मिली और आनन-फानन में सरकार ने बिना यथास्थिति की जानकारी लिए एसडीएम को निलंबित कर दिया। बाद में जब जिलाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने दीवार गिराने के आदेश ही नहीं दिए थे तो ये कहा जाने लगा कि जिलाधिकारी ने रिपोर्ट समय से नहीं दी, अगर ऐसा होता तो सरकार किसी भी कार्रवाई से पहले विचार करती। हालांकि कई जगह स्थानीय लोगों के हवाले से ये रिपोर्ट्स भी सामने आईं कि उनके गांव में सांप्रदायिक तनाव के हालात बने ही नहीं थे। ना तो उस दीवार के गिराने से पहले ना ही बाद में। सरकार इस मसले पर कहती रही है कि उनके पास स्थानीय इंटेलीजेंस की जानकारी थी कि इलाके में तनाव फैल सकता है।

अगर सरकार के तर्क को ही सही माना जाए तो सवाल ये उठता है कि बिना जिलाधिकारी की रिपोर्ट के एक प्रशासनिक अधिकारी को निलंबित कैसे कर दिया गया, आखिर इतनी जल्दी क्या थी? वहीं इसी हफ्ते पुराने लखनऊ के कई इलाकों में एक ही संप्रदाय के दो फिरकों के बीच हुए दंगों समेत पिछले सवा साल में दर्जन भर जिलों में हुए सांप्रदायिक दंगों के पहले इतनी मुस्तैदी क्यों नहीं दिखाई गई और दंगों के दौरान वहां तैनात कितने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।

2009 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक किसी भी सार्वजनिक सड़क, पार्क या फिर जगहों पर किसी भी तरह का धार्मिक निर्माण नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2009 को दिए गए अपने इसी फैसले में निर्देश दिए थे कि जिलाधिकारी इस आदेश का पालन कराएं।

अगर हम राज्य सरकार की दलीलों को ही सही मानें तो भी दुर्गा शक्ति नागपाल ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का ही पालन कराया है। ऐसे में एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के काम को लेकर प्रोत्साहित करने के बदले उन्हें निलंबित करना सरकार की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े करता है।

Thursday, 8 August 2013

चुप रहने का बेशर्म इतिहास



प्रवीण गुगनानी


आज फिर भारत शोक संतृप्त है और शर्मसार भी! हैरान भी है और परेशान भी!! निर्णय के मूड में भी है और अनिर्णय के झंझावात में भी!!! पाकिस्तान की शैतानी सेना और आतंकवादियों की ढाल बनी सेना ने पुंछ सेक्टर में एक बार फिर आक्रामक होकर हमारे पांच सैनिकों की ह्त्या कर दिया और हमारा देश इन वीर शहीदों की लाशों पर आंसू बहा रहा है. रात के अंधेरे में छिपकर किये गये इस कायराना हमले में पाकिस्तान ने जिस प्रकार हमारे सैनिकों की नृशंस ह्त्या की उससे हमारे प्रधानमन्त्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री इस अवसर पर सदा की भांति किंकर्तव्यविमूढ़ हो गएँ हैं. इसके बाद भी वे बेतुके बयान और बेहयाई भरे हाव भाव का प्रदर्शन करनें में बिलकुल भी रूक नहीं रहे हैं.
एक बार फिर हमारी इन तीनों मंत्रियों की राष्ट्रीय टोली स्थितियों को सैन्य या राजनयिक चतुराई भरी आक्रामकता के स्थान पर केवल निराशाजनक, बेवकूफियों भरें और आक्रामकता विहीन आचरण का प्रदर्शन कर रही है. हमारे रक्षा मंत्री एंटोनी ने तो बाकायदा दोहरे अर्थ निकालने वाला आधिकारिक वक्तव्य संसद में दिया और पाकिस्तान को भाग निकलने का सटीक मौका देकर देश को हाथ मलते रहनें के लिए मजबूर कर दिया. मनमोहन सिंग के प्रधानमंत्रित्व काल के एक दशक में हमनें न जानें कितनें ही पाकिस्तानी दंश झेल लिए किन्तु प्रत्येक सैन्य और राजनयिक दंश का जवाब भारत ने केवल अपनी तथाकथित समझदारी से ही दिया है; कहना न होगा कि पाकिस्तान के सामनें हम भीरु, दब्बू और कमजोर आचरण की एक लम्बी श्रंखला प्रस्तुत कर विश्व समुदाय के सामनें अपनी स्थिति को खराब और दुर्बल कर चुकें हैं.
पाकिस्तान के साथ सम्बंधों के सन्दर्भ में हम शिमला समझौते की बात करें या इसके बाद इसी विषय पर जारी घोषणा पत्र पर पाकिस्तानी धोखे की बात करें, साठ के दशक में पाकिस्तानी सैन्य अभियानों के साथ साथ कश्मीर से छेड़छाड़ के दुष्प्रयासों की बात करें या 2003 के युद्ध विराम की बात करें या संसद पर हमलें और मुंबई के धमाकों को याद करें या हमारे दो सैनिकों की ह्त्या कर उनकी सर कटी लाश हमें देने के दुस्साहस की बात करें या इस परिप्रेक्ष्य में हुए कितनें ही पाकिस्तानी घातों और भारतीय अभियानों की बात करें तो हमारें पास केवल धोखें खानें और चुप्पी रख लेनें का बेशर्म इतिहास ही तो बचता है! 1971 में पाकिस्तान के विभाजन के समय जैसे कुछेक अवसर ही आये हैं जब हम भारतीय अपनी आँखें ऊँची कर पाये हैं, अन्यथा घटनाओं के आईने से तो इतिहास हमें शायद ही क्षमा कर पाए.
हम हमारें पिछलें पैसठ वर्षों के इतिहास पर न जाएँ और पिछले लगभग एक वर्ष की घटनाओं की ही समीक्षा कर लें तो हमें लगेगा कि हमें भूलने की बीमारी हो गई है या हमारी स्मृति लोप बेशर्मी की हद तक हो गया है. पिछलें वर्ष हुई भारत-पाकिस्तान के बीच घटी इन घटनाओं की समीक्षा हमें निराशा के गहरें सागर में डुबो सकती है किन्तु फिर भी हमें इन्हें पढना, बोलना और समझना ही होगा क्योंकि इतिहास को पढ़कर आत्मलोचन और आत्मावलोकन कर लेनें से ही हम भविष्य के लिए तैयार हो पायेंगे. इन घटनाओं से हमें यह पता चलता है कि हमारा केन्द्रीय नेतृत्व कितना आत्ममुग्ध, पंगु, बेशर्म और बेगैरत गो गया है. जरा याद कीजिये इन शर्मनाक घटनाओं को-
सितम्बर, 2012- मीनार-ए-पाकिस्तान पर विदेश मंत्री
हमारे विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा पाकिस्तानी प्रवास के दौरान मीनार-ए-पाकिस्तान पर तफरीह के लिए पहुँच गए थे. यही वह स्थान है जहां 1940 में पृथक पाकिस्तान जैसा देशद्रोही, भारत विभाजक प्रस्ताव पारित हुआ था. एक देश का भाषण दूसरे देश में भूल से पढ़कर भद्द पिटवाने वाले हमारे विदेश मंत्री कृष्णा जी को और उनके स्टाफ को यह पता होना चाहिए था कि द्विराष्ट्र के बीजारोपण करनें वाले इस स्थान पर उनके जाने से राष्ट्र के दो टुकड़े हो जाने की हम भारतीयों की पीड़ा बढ़ जायेगी और हमारें राष्ट्रीय घांव हरे हो जायेंगे. देशवासियों की भावनाओं का ध्यान हमारें विदेश मंत्री कृष्ण को होना ही चाहिए था जो अंततः उन्हें नहीं रहा और पाकिस्तान ने उन्हें कूटनीतिपूर्वक इस स्थान पर ले जाकर हमें इतिहास न पढने, न स्मरण रखने वाले राष्ट्र का तमगा दे डाला. हमारे विदेश मंत्री को ध्यान रखना चाहिए कि भारत-पाकिस्तान के परस्पर सम्बंध कोई अन्य दो सामान्य राष्ट्रों के परस्पर सम्बंधों जैसे नहीं हैं; हमारी बहुत सी नसें किसी पाकिस्तानी हवा के भी छू भर लेनें से हमें ह्रदय विदारक कष्ट दे सकती है या हमारें स्वाभिमान को तार तार कर सकती है!! हैरानी है कि इस बात को हमारा गली मोहल्लें में क्रिकेट खेलनें वाला नौनिहाल जानता है उसे तथाकथित विद्वान् विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा नहीं समझ पाए.
अक्तूबर 2012– चीन ने पाकिस्तानी बंदरगाह ग्वादर का अधिग्रहण किया भारत रहा चुप
चीन और पाकिस्तान के सामनें जिस प्रकार भारतीय विदेश और रक्षा नीति विफल हो रही है वह बेहद शर्मनाक है. इस दोनों देशों का कूटनीतिक समन्वय तोड़ना भी भारत की प्राथमिकता में होना चाहिए जो नहीं है. पाक स्थित ग्वादर बंदरगाह के चीनियों द्वारा अधिग्रहण और उसकी विशाल विकास योजनाओं के समाचारों की पुष्टि से भारत को सचेत होना चाहिए था किन्तु भारत ने वैश्विक स्तर पर और चीन के सामनें व्यवस्थित विरोध प्रकट नहीं किया. चीन के साथ हो रहे ७० अरब डालर के व्यापार का संतुलन पचास अरब डालर घाटे का है अर्थात हम चीन को पचास अरब डालर के आयत के सामनें मात्र २० अरब डालर का ही निर्यात कर पातें हैं अर्थ स्पष्ट है कि चीन को हमारी अधिक आवश्यकता है, किन्तु इस तथ्य का भी हम लाभ नहीं उठा पायें हैं. फलस्वरूप भारतीय दृष्टि से सामरिक महत्व के ठिकाने या तो चीन के कब्जे में चलें जायेंगे या उसकी सीधी निगरानी में रहने को मजबूर हो जायेंगे जो कि दीर्घ काल में सैन्य दृष्टि से हानिकारक होगा.
नवम्बर, 2012: अतीत भूलो क्रिकेट खेलो
नवम्बर में जब पूरा भारत पाक के विरुद्ध उबल रहा था, हमारी सेनायें संघर्ष कर रही थी, पाक प्रशिक्षित आतंकवादी पुरे देश में ग़दर कर रहे थे और सामान्य जनता पाक में हो रहे हिन्दुओं पर अत्याचारों के कारण उससे घृणा कर रही थी और पाक के साथ आर पार के मूड में थी न कि क्रिकेट खेलनें के तब हमारें गृह मंत्री ने बयान दिया कि हमारें देश को अतीत को भूल कर पाक के साथ क्रिकेट खेलना चाहिए!! पाकिस्तान से क्रिकेट खेलनें के लिए भारत की जनता को सार्वजनिक रूप से यह बयान देते समय शिंदे जी लगता है सचमुच भारत के प्रति पाकिस्तान की कड़वाहट, अपमान और छदम कारस्तानियों को भूल गएँ थे. भारतीय गणराज्य के केन्द्रीय गृह मंत्री होने के नाते यह निकृष्ट सलाह देते समय शिंदे जी को एक आम भारतीय के इस प्रश्न का जवाब देते न बना था कि “भारत पाकिस्तान सम्बन्धों के सबसे ताजा कुछ महीनों पहले के उस प्रसंग को हम कैसे भूल जाएँ जिसमें पाकिस्तान की खूबसूरत विदेश मंत्रीं हिना की जुबान पर यह धोखे से सच आ गया था कि “आतंकवाद पाकिस्तान का अतीत का मंत्र था, आतंकवाद भविष्य का मंत्र नहीं है”. अनजाने ही सही पर यह कड़वा और बदसूरत सच हिना रब्बानी की हसीं जुबाँ पर आ ही गया था और पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों ने भी इस धोखे से निकल पड़े इस बयान को लेकर अन्दरखानें हिना की लानत मलामत भी की थी. तब इस बात को देशवासी तो अवश्य याद कर रहे थे और गृह मंत्री जी से भी आग्रह कर रहे थे कि भले ही ये सभी कुछ आप भूल जाएँ और खूब मन ध्यान से क्रिकेट खेलें और खिलाएं किन्तु ऐसा परामर्श कहीं भूल से भी देश के रक्षा मंत्री को न दे बैठें नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा!!
तब भारतीय अवाम ने सुशील शिंदें से यह पूछा था कि पाकिस्तानी धन बल और मदद से कश्मीर में विध्वंस कर रहे अलगाव वादी संगठन अहले हदीस के हुर्रियत और आई. एस. आई. से सम्बन्ध और इसकी 600 मस्जिदों और 120 मदरसो से पूरी घाटी में अलगाव फैलाने की बात तो हमारा अतीत नहीं वर्तमान है तो अब क्या हमें क्रिकेट खेलनें के लिए वर्तमान से भी आँखें चुराना होगी? क्रिकेट की थोथी खुमारी के लिए क्या हम वास्तविकताओं से मुंह मोड़ कर शुतुरमुर्ग की भाँति रेत में सर छुपा लें? कश्मीर की शांत और सुरम्य घाटी में युवकों की मानसिकता को जहरीला किसने बनाया? किसने इनके हाथों में पुस्तकों की जगह अत्याधुनिक हथियार दिए है? किसने इस घाटी को अशांति और संघर्ष के अनहद तूफ़ान में ठेल दिया है?
इस चुनौतीपूर्ण वर्तमान को हम भूल जाएँ तो कैसे और उस षड्यंत्रों से भरे अतीत को छोड़ें तो कैसे शिंदे जी जिसमें अन्तराष्ट्रीय मंचों से लेकर भारत के कण कण पर कश्मीर के विभाजन, कब्जे और आक्रमण की इबारत पाकिस्तान ने लिख रखी है? दिल्ली, मेरठ और लखनऊ की गलियों में ठेला चलाते और निर्धनतापूर्ण जीवन जीते उन निर्वासित कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को हम कैसे भूलें जो करोड़ो अरबों रूपये वार्षिक की उपज उपजाने वालें केसर खेतों के मालिक थे? तब देश की आत्मा ने शिंदे से यही और केवल यही कहा था कि शिंदे जी हम अतीत और वर्तमान की हमारी छलनी, रक्त रिसती और वेदना भरी राष्ट्रीय पदेलियों के घावों को भूलना नहीं बल्कि उन्हें देखते रहना और ठीक करना चाहते हैं और आपको भी इस राष्ट्र की इस आम राय से हम राय हो जाना चाहिए!
कृपया इतिहास को न केवल स्मृतियों में ताजा रखें बल्कि उसे और अच्छे और प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध करें! शिवाजी से लेकर महाराणा प्रताप और लक्ष्मी बाई के गौरवपूर्ण इतिहास से लेकर बाबरों, मुगलों, गजनवियों, अफजलों और कसाबों के षड्यंत्रों को हमें याद रखना भी रखना होगा और आने वाली पीढ़ी को व्यवस्थित लिपिबद्ध करके भी देना होगा क्योंकि क्रिकेट हमारी प्राथमिकता हो न हो किन्तु राष्ट्रवाद का आग्रह और राष्ट्र के दुश्मनों की पहचान और उनसें उस अनुरूप व्यवहार हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकता है और रहेगी.

शहीदों का अंतिम संस्कार, नहीं पहुंचे नीतीश



आज सुबह पाक हमले में अपनी जान गंवाने वाले बिहार के चार सपूतों और मराठा रेजीमेंट एक जवान का अंतिम सरकार कर दिया गया. लेकिन अंतिम सरकार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उपस्थित न होने के कारण उन्हें निंदा का शिकार होना पड रहा है.

गौरतलब है कि कल रात जब इन शहीदों का शव पटना एयरपोर्ट लाया गया, तो उनकी अगुवाई में मुख्यमंत्री तो दूर प्रदेश का कोई मंत्री भी नहीं पहुंचा. प्राप्त जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री अभी दिल्ली गये हुए हैं. प्रदेश सरकार की इस बेरुखी ने उन्हें विपक्ष की निंदा का केंद्र बना दिया है.

भाजपा नेता गिरिराज ने नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए उन्हें संवेदनहीन मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है. उन्होंने कहा कि इतना संवेदनहीन मुख्यमंत्री उन्होंने अपने जीवन में नहीं देखा. मात्र दस लाख रुपये मुआवजा घोषित कर देने से इन शहीदों को सम्मान नहीं मिलेगा, बल्कि उनके परिजनों के साथ खडा होना सरकार के लिए जरूरी है.

शहीद हुए सैनिकों से ऐसी बेरुखी को लेकर लोगों में काफी नाराजगी है. पटना एयरपोर्ट पर सुशील मोदी और गिरिराज सिंह समेत बीजेपी के कई नेता और कार्यकर्ता पहुंचे थे. इन लोगों का आरोप है कि नीतीश सरकार संवेदनहीन है. इससे पहले जवानों के शव पुंछ से जम्मू लाए जाने पर वहां भी कोई अधिकारी या मंत्री नहीं पहुंचा था.

एयरफोर्स का विशेष विमान शहीदों विजय राय (बिहटा), शंभू शरण सिंह (भोजपुर), प्रेमनाथ सिंह (छपरा) और रघुनंदन (छपरा) के शवों को लेकर बुधवार रात 10 बजे पटना एयरपोर्ट पहुंचा. स्टेट हैंगर में सेना की सलामी के बाद जवानों के शवों को उनके पैतृक गांवों के लिए रवाना कर दिया गया. एयरपोर्ट पर बिहार सरकार के किसी भी मंत्री के न आने को लेकर रात 11 बजे जब एबीपी न्‍यूज के रिपोर्टर ने कई मंत्रियों के घर पर दस्तक दी.

नीतीश ने पाक से दोस्‍ती का राग अलापा




पाकिस्तान के कायराना हमले से देश गुस्से में है। शहीद जवानों के घर पर मातम है, लेकिन बिहार के सीएम नीतीश कुमार इतना कुछ हो जाने के बावजूद पाकिस्तान से दोस्ती का राग अलाप रहे हैं। जब पूरा देश गुस्से में शहीद जवानों के साथ खड़ा है और धोखेबाज पाक पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहा है, तब नीतीश कुमार का ऐसा बयान चौकाने वाला है। बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है, 'नवाब शरीफ भारत से अच्‍छे संबंध रखना चाहते हैं। अभी वहां नई सरकार बनी है, हमें उन्‍हें समय देना चाहिए।'

बिहार के छपरा में मातम, आरा में भी गुस्से की लहर, दानापुर में भी ना'पाक' करतूत से मातम। मातम में डूबे इन लोगों के इस गुस्से और दुख से बिहार के सीएम नीतीश कुमार कुछ अलग ही राय रखते हैं। क्या बिहार के सीएम को नापाक हमले की हकीकत नहीं मालूम? क्या अपने ही सूबे के गम में डूबे हुए इन लोगों के आंसू और दर्द की नीतीश को परवाह नहीं? इतने बड़े विश्वासघात और नापाक करतूत के बावजूद नीतीश किस मुगालते में हैं? यह समझना वाकई बहुत मुश्किल है, हालांकि बीजेपी ने भी मौका लपकने में कोई देरी नहीं की और नीतीश को कांग्रेसी मानसिकता से ग्रसित करार दिया।

देश को मिले इस दर्द पर यह वक्त राजनीति का नहीं है, लेकिन ऐसे वक्त में नीतीश की नरमी कहीं ना कहीं यह सवाल जरूर उठा गई कि आखिर कब तक हमारे राजनेता नापाक करतूतों पर नरमी दिखाते रहेंगे। अवाम भी यही पूछ रही है, आखिर कब जागेंगे हम...?
पुंछ में शहीद हुए जवानों पर हमारे राजनेताओं के अजब बोल सुनने को मिल रहे हैं। मंत्री-नेता अपने बयानों से जवानों की शहादत का मजाक उड़ा रहे हैं। बिहार के ग्रामीण कार्यमंत्री भीम सिंह ने ऐसा ही एक बयान देकर शहीदों की शहादत का मजाक उड़ाया है। भीम सिंह ने कहा है कि सेना और पुलिस में लोग शहीद होने के लिए ही जाते हैं। हालांकि नीतीश कुमार की फटकार के बाद मंत्रीजी ने अपने बयान पर माफी मांग ली और कहा कि मेरा बयान तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
जब भीम सिंह से बिहार के जवानों की शहादत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लोग सेना और पुलिस में शहीद होने के लिए ही जाते हैं। जब पत्रकारों ने ये पूछा कि बिहार का कोई मंत्री जवानों के अंतिम संस्कार में क्यों नहीं गया, तो उन्होंने उल्टा सवाल दागते हुए कहा कि क्या आपके माता-पिता शहीद के अंतिम संस्कार में गए थे।
उधर, बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि इस तरह का बयान शहीदों का अपमान है और इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भीम को तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए। उन्होंने कहा भीम सिंह क्या कहना चाहते हैं कि सैनिक मरने के लिए और नेता राज करने के लिए होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप किसी को सांत्वना नहीं दे सकते तो उसके जख्मों पर नमक तो नहीं छिड़कना चाहिए।
गौरतलब है कि सीमा पर पाक हमले में मारे गए पांच जवानों में से एक शहीद प्रेम नाथ का अंति‍म संस्कांर आज सुबह छपरा में कर दिया गया। बिहार सरकार की ओर से कहा गया था कि शहीदों का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा, लेकिन प्रेम नाथ के अंति‍म संस्कार में बि‍हार सरकार का एक भी मंत्री नहीं पहुंचा। वहीं बिहार रेजीमेंट के चारों शहीद जवानों का पार्थिव शरीर जब पटना एयरपोर्ट पर पहुंचा तो बिहार सरकार का कोई भी नुमाइंदा मौजूद नहीं था।